डॉ मनोज कुमार तिवारी
वरिष्ठ परामर्शदाता
एआरटीसी, एसएस हॉस्पिटल, आईएमएस, बीएचयू, वाराणसी
यदि आप अपनी सेहत को लेकर सदैव चिंतित रहतें हैं, अपने शरीर में गांठ, झुनझुनी या दर्द जैसे बीमारी के लक्षणों की नियमित रूप से जांच करतें हैं, हमेशा लोगों से यह आश्वासन चाहते हैं कि आप बीमार नहीं हैं, सदैव सोचते रहतें हैं कि मेडिकल टेस्ट में कुछ छूट तो नहीं गया या इंटरनेट पर स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को हद से ज्यादा खोजते हैं तो आप बीमारी संबंधी चिंता विकार से ग्रस्त हो सकते हैं।
इलनेस एंग्जायटी डिसऑर्डर/हेल्थ एंग्जायटी डिसऑर्डर को बीमारी संबंधी चिंता विकार या हाइपोकॉन्ड्रिया भी कहते हैं। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति को लगातार डर रहता है कि उसे कोई गंभीर/ जानलेवा बीमारी ( कैंसर या दिल का दौरा) होने वाली है। सामान्य शारीरिक बदलावों या लक्षणों को भी व्यक्ति बहुत बड़ी बीमारी समझता है। बीमारी संबंधी चिंता विकार (हाइपोकॉन्ड्रिया) अत्यंत दुर्लभ है। यह लगभग 0.1% लोगों को प्रभावित करता है। बीमारी संबंधी चिंता विकार युवावस्था के शुरुआती या मध्य में शुरू होता है और उम्र के साथ बढता है। वृद्धजनों में स्वास्थ्य संबंधी चिंता उनकी याददाश्त खोने का डर होता है।
बीमारी संबंधी चिंता विकार के दो प्रकार हैं:-
ईलाज की अत्यधिक आवश्यकता:- ये स्वास्थ्य सेवा केंद्र में काफी समय बिताते हैं और कई विशेषज्ञों से सलाह लेते हैं। बार बार चिकित्सीय जाँच का अनुरोध करते हैं।
ईलाज से बचने की प्रवृत्ति:- ये स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और चिकित्सा देखभाल से बचने की कोशिश करते हैं। इन्हें चिकित्सक पर भरोसा नहीं होता है। इन्हें लगता है कि चिकित्सक लक्षणों को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं जिससे इनमें और अधिक चिंता उत्पन्न होती है।
लक्षण:-
बार-बार स्वास्थ्य की जांच करना:- पीडित बार-बार अपना ब्लड प्रेशर, शुगर, नब्ज नापना या शरीर पर किसी तिल/निशान को बार- बार देखकर चिंतित होना।
गूगल पर बीमारी खोजना:- छोटे लक्षणों के लिए इंटरनेट पर गंभीर बीमारी ढूंढना।
बार बार चिकित्सक से मिलना:- लगातार व बार – बार मेडिकल जाँच करवाना और चिकित्सक के यह कहने पर भी संतुष्ट न होना कि आप बिल्कुल स्वस्थ हैं।
घबराहट:- बीमारी के बारे में अधिक सोचने से उत्पन्न अत्यधिक तनाव के कारण दिल की धड़कन तेज होना, पसीना आना, बैचेनी या चक्कर आना।
लगातार डर:- बीमारी होने के विचार से दिनभर परेशान व भयभीत रहना व रुचिकर कामों में भी मन न लगना।
कारण:-
बचपन का मानसिक आघात:- बचपन में किसी गंभीर बीमारी का सामना करना या परिवार में किसी की गंभीर बीमारी और मौत देखना। इस विकार एक प्रमुख कारण है।
अत्यधिक तनाव:- जीवन में उच्च स्तर व लंबे समय तक रहने वाला मानसिक तनाव, नौकरी या कार्य का दबाव या व्यक्तिगत समस्याएं।
इंटरनेट:- लक्षणों को बार-बार ऑनलाइन गूगल पर सर्च करना (जिसे साइबरकॉन्ड्रिया कहा जाता है) तथा गलत जानकारी होने से सदैव डरे रहना।
पारिवारिक इतिहास:- माता-पिता, परिवार के अन्य सदस्यों या निकट रिश्तेदार में का बहुत ज़्यादा चिंतित रहने का स्वभाव होना।
मस्तिष्क के रसायन:- मस्तिष्क में कुछ रसायनों (न्यूरोट्रांसमीटर) का असंतुलन होना जो डर व चिंता को नियंत्रित करते हैं।
बीमारी का पिछला अनुभव:- अतीत में किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित होना या गलत मेडिकल टेस्ट जिसका असर मन पर गहरा असर डाला हो।
जोखिम कारक:-
# जीवन में अत्यधिक तनाव का होना
# किसी गंभीर बीमारी का खतरा जो अंततः गंभीर न निकले
# बचपन में दुर्व्यवहार/ मानसिक आघात
# बचपन में गंभीर बीमारी होना
# माता/पिता को गंभीर बीमारी होना
# अत्यधिक चिंता करने की प्रवृत्ति
# स्वास्थ्य संबंधी जानकारी के लिए इंटरनेट का अत्यधिक उपयोग करना।
जटिलताऐं:-
# अत्यधिक चिंता करने से दूसरों को निराशा होती है, जिससे रिश्तों में या पारिवार में समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
# कार्य निष्पादन में गिरावट
# कार्य स्थल पर अत्यधिक अनुपस्थिति
# दैनिक जीवन के कामकाज में समस्याएं
# स्वास्थ्य देखभाल हेतु यात्रा और चिकित्सा व्ययों के कारण वित्तीय समस्याएं
# अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित होना, जैसे- दैहिक लक्षण विकार, उच्च तनाव, अवसाद, व्यक्तित्व विकार व अन्य
वचाव के उपाय:-
इंटरनेट पर सर्च न करें:- लक्षणों के बारे में बार-बार गूगल पर पढ़ना तुरंत बंद करें, इससे डर और बढ़ता है। चिकित्सक से सलाह लें तथा उस पर विश्वास रखें।
ध्यान और योग करें:- मन को शांत रखने के लिए लम्बी गहरी सांस लेने के अभ्यास और ध्यान की मदद लें।
बीमारी सम्बंधित कार्यक्रम से बचें:-
गंभीर बीमारी से संबंधित किसी भी कार्यक्रम देखने व सुनने से बचें। इससे
बीमारी सम्बंधित दुश्चिंता विकार के लक्षण के बढने व गंभीर होने का जोखिम बढ जाता है।
सामान्य गतिविधियों से जुडे़:-
बीमारी संबंधी चिंताओं के कारण जिन क्रियाकलापों से आप बचते आ रहें हों, जैसे- खेलकूद या सामाजिक गतिविधियों को धीरे-धीरे शुरू करें।
ध्यान भटकाएं:- जब भी बीमारी का विचार आए, खुद को अपने किसी मन पसंद के काम या बातचीत में व्यस्त करें। जब आपको अपने शरीर की जांच करने की तीव्र इच्छा हो तो टहलने जाऐं या दोस्तों से बातें करें।
खुद को शांत रखें:-
यदि स्वास्थ्य की चिंता अधिक सताऐ तो शांत मन से इस बारे में सोचिए कि जो बीमारी है ही नहीं उससे क्यों डरना है और अपने जीवन के अच्छे दिनों को याद करें। अपने को पसंदीदा काम में व्यस्त रखिए।
मनोवैज्ञानिक परामर्श लें:- यदि स्थिति रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करे, तो अच्छे मनोचिकित्सक से परामर्श लें। मनोचिकित्सक कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी व अन्य व्यवहारिक चिकित्सा से सहयोग देतें हैं।।
दवाएँ:-
एंटीडिप्रेसेंट व चिंता-विरोधी दवाएं चिंता को तुरंत कम करने के लिए दी जाती हैं। दवाएं चिकित्सक के सलाह अनुसार ही लें अपने से डोज मेँ परिवर्तन न करें।
अपने स्वास्थ्य की देखभाल की चिंता करना एक सामान्य प्रवृत्ति है किंतु जब यह प्रवृत्ति दिनचर्या के कार्यों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने लगे तो उपरोक्त उपायों को अपनाकर इससे मुक्त रह सकते हैं बताए गये उपायों को अपनाने के बाद भी यदि बीमारी संबंधी दुश्चिंता कम नहीं होती है तो मनोवैज्ञानिक परामर्श लेना चाहिए। आवश्यक होने पर मानसिक रोग विशेषज्ञ से मिलकर उपचार कराना चाहिए।


