नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में जारी संकट का असर अब भारत के विकास कार्यों पर भी दिखाई देने लगा है। बिटुमिन (डामर) की भारी कमी और कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के चलते देशभर में सड़क निर्माण और अन्य विकास परियोजनाएं प्रभावित हो रही हैं। खासकर हाईवे और सड़क निर्माण से जुड़े कार्यों की रफ्तार धीमी पड़ गई है, जिससे निर्माण एजेंसियों और ठेकेदारों की चिंता बढ़ गई है।
जानकारी के अनुसार भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 40 प्रतिशत बिटुमिन खाड़ी देशों से आयात करता है। पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट में बाधा के कारण आयात प्रभावित हुआ है, जिसका सीधा असर घरेलू बाजार पर पड़ा है। बिटुमिन की आपूर्ति घटने के साथ ही इसकी कीमतों में भी लगातार उछाल दर्ज किया गया है।
राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं से जुड़े ठेकेदारों ने इस समस्या को भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के सामने उठाया है। हाल ही में ठेकेदारों ने एनएचएआई चेयरमैन संतोष यादव से मुलाकात कर बिटुमिन की कमी और दामों में तेजी से बढ़ोतरी की जानकारी दी। इसके बाद एनएचएआई और तेल कंपनियों के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं।
तेल कंपनियों का कहना है कि वे घरेलू उत्पादन बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2026 में बिटुमिन का घरेलू उत्पादन 547 लाख मीट्रिक टन था, जो मार्च तक बढ़कर 605 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया। इसके बावजूद मांग के मुकाबले आपूर्ति कम पड़ रही है। मार्च में बिटुमिन की खपत 1017 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गई, जिससे बाजार में संकट और गहरा गया।
डामर की कीमतों में भी भारी बढ़ोतरी देखने को मिली है। फरवरी की शुरुआत में जहां बिटुमिन की कीमत करीब 48 हजार रुपये प्रति मीट्रिक टन थी, वहीं अप्रैल के मध्य तक यह बढ़कर 82 हजार रुपये प्रति मीट्रिक टन से अधिक हो गई। बढ़ती लागत को देखते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने जून 2026 तक ठेकेदारों को मूल्य समायोजन की राहत देने का फैसला भी किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो सड़क निर्माण और अन्य आधारभूत परियोजनाओं की लागत और बढ़ सकती है, जिससे विकास कार्यों की गति पर व्यापक असर पड़ने की आशंका है।


