लखनऊ
प्रदेश में स्मार्ट प्रीपेड मीटर को लेकर उठे भारी विरोध और जनता के गुस्से ने आखिरकार सरकार को अपने फैसले पर यू-टर्न लेने के लिए मजबूर कर दिया। प्रदेशभर में बढ़ती नाराजगी, बिजली कटौती और बढ़े हुए बिलों की शिकायतों के बीच सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा था। संघ और भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार संगठन स्तर से सरकार को साफ फीडबैक दिया गया कि यदि स्मार्ट प्रीपेड मीटर का फैसला जल्द वापस नहीं लिया गया, तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।
अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि जल्द होने वाले मंत्रिमंडल विस्तार में ऊर्जा मंत्री एके शर्मा से ऊर्जा विभाग वापस लिया जा सकता है। भाजपा और संघ के उच्च स्तर पर इस मुद्दे को लेकर लगातार मंथन चल रहा है। माना जा रहा है कि स्मार्ट मीटर विवाद ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है, जिसका असर सीधे जनता के बीच दिखाई दिया।
दरअसल, प्रदेश में करीब 3.58 करोड़ घरेलू बिजली उपभोक्ता हैं। फरवरी 2026 तक लगभग 87 लाख घरों में स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके थे, जिनमें से 82 लाख स्मार्ट पोस्टपेड मीटर थे। आरोप है कि विभाग ने उपभोक्ताओं की सहमति के बिना ही इन मीटरों को प्रीपेड सिस्टम में बदलना शुरू कर दिया। जनवरी से यह प्रक्रिया तेज हुई और मार्च-अप्रैल आते-आते बकाया दिखाकर बिजली कनेक्शन काटने की कार्रवाई शुरू हो गई।
सबसे ज्यादा नाराजगी तब बढ़ी जब विभाग ने एक साथ करीब 5 लाख घरों की बिजली निगेटिव बैलेंस बताकर काट दी। कई उपभोक्ताओं ने रिचार्ज कराने के बाद भी घंटों और कई जगह दिनों तक बिजली सप्लाई बहाल न होने की शिकायत की। लोगों ने विरोध प्रदर्शन किए, जिसके बाद विभाग ने तकनीकी खराबी का हवाला देकर सफाई दी।
सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो भी वायरल हुए, जिनमें बिना बिजली उपयोग के भी स्मार्ट प्रीपेड मीटर में यूनिट बढ़ने के दावे किए गए। इससे आम लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती चली गई कि स्मार्ट मीटर तेज चलते हैं और अधिक बिल भेज रहे हैं। हालांकि बिजली विभाग इस डर और भ्रम को दूर करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ।
उपभोक्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह भी रही कि बिल संबंधी शिकायतों के समाधान के लिए कोई मजबूत व्यवस्था नहीं थी। हेल्पलाइन नंबर 1912 पर दर्ज शिकायतें बिना समाधान के बंद किए जाने के आरोप लगे। वहीं, सोलर प्लांट लगाने वाले उपभोक्ताओं ने भी विभाग पर गंभीर सवाल उठाए। आरोप है कि कई जगह नेट मीटर हटाकर स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगा दिए गए, जिससे सोलर ऊर्जा का समायोजन बंद हो गया और लोगों को भारी-भरकम बिजली बिल भेजे गए।
स्मार्ट मीटर विवाद अब केवल तकनीकी या बिजली विभाग का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राजनीतिक मुद्दा बन चुका है। सरकार अब जनता की नाराजगी को शांत करने और चुनावी नुकसान से बचने के लिए डैमेज कंट्रोल में जुटी हुई दिखाई दे रही है।


