शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की पहचान लंबे समय से देश के सबसे बड़े और सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों में होती रही है। ऐसे विशाल प्रदेश में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम करना आसान काम नहीं है। बढ़ता शहरीकरण, वाहनों की संख्या, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक विस्तार और कचरे का दबाव हवा की गुणवत्ता के लिए लगातार चुनौती पैदा करते हैं। ऐसे समय में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में उत्तर प्रदेश के 16 शहरों का राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन और राजधानी लखनऊ का देश में पहला स्थान हासिल करना निश्चित रूप से उल्लेखनीय उपलब्धि है।
लखनऊ ने 198 अंक प्राप्त कर इंदौर को पीछे छोड़ा और देश के सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले बड़े शहर के रूप में अपनी जगह बनाई। इंदौर को 197 और जबलपुर को 195 अंक मिले। यह अंतर भले ही बहुत बड़ा न हो, लेकिन संदेश बड़ा है—उत्तर प्रदेश की राजधानी अब वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए योजनाबद्ध प्रयासों के जरिए राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अग्रिम पंक्ति में पहुंच रही है।
इस उपलब्धि को केवल लखनऊ की सफलता मानना भी उचित नहीं होगा। आगरा, गाजियाबाद, कानपुर और प्रयागराज जैसे शहरों ने भी बड़ी आबादी वाले शहरों की श्रेणी में उल्लेखनीय स्थान हासिल किए। मध्यम आबादी वाले शहरों में फिरोजाबाद, झांसी, मुरादाबाद और नोएडा का प्रदर्शन बताता है कि स्वच्छ हवा का अभियान केवल राजधानी या महानगरों तक सीमित नहीं है। रायबरेली, अनपरा, खुर्जा और गजरौला जैसे छोटे शहरों की राष्ट्रीय रैंकिंग में मौजूदगी इस अभियान के व्यापक प्रभाव की ओर संकेत करती है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वच्छ हवा की लड़ाई अब केवल शहर की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गई है। वार्ड स्तर तक इसके प्रभाव दिखाई दे रहे हैं। लखनऊ के वार्ड-70 का देश में प्रथम स्थान हासिल करना बताता है कि प्रदूषण नियंत्रण की वास्तविक सफलता तभी संभव है, जब योजनाओं का प्रभाव जमीन पर और स्थानीय स्तर पर दिखाई दे। प्रयागराज के वार्ड-31 सहित अन्य वार्डों का बेहतर प्रदर्शन भी इसी दिशा में सकारात्मक संकेत है।
किसी शहर को स्वच्छ वायु की श्रेणी में देश में शीर्ष स्थान मिलना महज कागजी उपलब्धि नहीं हो सकती। इसके पीछे परिवहन, सड़क, कचरा प्रबंधन, हरित क्षेत्र और स्थानीय प्रशासन की संयुक्त भूमिका होती है। लखनऊ में डोर-टू-डोर कूड़ा संग्रहण के लिए करीब 1,100 इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए 12 चार्जिंग स्टेशन और 916 चार्जिंग प्वाइंट, 140 इलेक्ट्रिक बसों का संचालन तथा 97 इलेक्ट्रिक यांत्रिक सफाई मशीनों का उपयोग इस दिशा में किए गए प्रयासों को रेखांकित करता है।
सड़क की धूल वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है। ऐसे में 559.85 किलोमीटर सड़कों को दोनों किनारों से पक्का किया जाना और यांत्रिक सफाई व्यवस्था को मजबूत करना उपयोगी कदम हैं। इसी तरह 2,550 टन प्रतिदिन क्षमता के साथ वैज्ञानिक कचरा प्रसंस्करण की व्यवस्था और खुले में कूड़ा जलाने पर रोक जैसे उपाय स्वच्छ हवा की रणनीति को मजबूती देते हैं।
हरियाली बढ़ाने के लिए वर्टिकल गार्डन और मियावाकी पद्धति से पौधरोपण जैसे प्रयास भी शहरी पर्यावरण को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। इन तमाम पहलों को अलग-अलग देखने के बजाय एक समग्र रणनीति के रूप में देखना चाहिए। यही इस उपलब्धि का वास्तविक महत्व है।
हालांकि किसी सर्वेक्षण में पहला स्थान मिलना उत्साह बढ़ाने वाला है, लेकिन स्वच्छ हवा की असली परीक्षा पुरस्कार मिलने के बाद शुरू होती है। शहर की हवा का स्वास्थ्य किसी एक वर्ष की रैंकिंग से तय नहीं होता। इसके लिए लगातार निगरानी, प्रदूषण के स्रोतों की पहचान और उन पर कठोर कार्रवाई जरूरी है।
निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल, पुराने और प्रदूषणकारी वाहन, यातायात का दबाव, खुले में कूड़ा जलाना, औद्योगिक उत्सर्जन और मौसम आधारित प्रदूषण जैसी चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। इसलिए इस उपलब्धि को मंजिल के बजाय एक मजबूत पड़ाव के रूप में देखा जाना चाहिए।
विशेष रूप से कानपुर, गाजियाबाद, आगरा और अन्य औद्योगिक एवं घनी आबादी वाले शहरों के लिए लखनऊ के अनुभवों से सीख लेकर स्थानीय जरूरतों के अनुरूप रणनीति तैयार करना महत्वपूर्ण होगा। हर शहर की प्रदूषण संबंधी समस्या अलग है, इसलिए एक ही मॉडल को हर जगह लागू करने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान तलाशने होंगे।
सरकार और नगर निकाय जितनी भी योजनाएं बना लें, स्वच्छ हवा का लक्ष्य नागरिकों की भागीदारी के बिना हासिल नहीं किया जा सकता। कूड़ा सड़क पर न फेंकना, उसे न जलाना, निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक और विद्युत परिवहन को प्राथमिकता देना, निर्माण सामग्री को खुले में न छोड़ना और अधिक से अधिक पौधरोपण जैसे छोटे कदम सामूहिक रूप से बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
लखनऊ की उपलब्धि का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वच्छ हवा केवल पर्यावरण विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि नगर निकाय, प्रशासन, उद्योग, परिवहन व्यवस्था और आम नागरिक,सभी की साझा जिम्मेदारी है। स्वच्छ वायु सर्वेक्षण-2026 में प्रदेश के 16 शहरों की मौजूदगी यह भरोसा पैदा करती है कि उत्तर प्रदेश के शहरी विकास में पर्यावरणीय सरोकार अब अधिक मजबूती से शामिल हो रहे हैं।
लखनऊ का प्रथम स्थान, फिरोजाबाद की उपलब्धि और अलग-अलग श्रेणियों में अन्य शहरों का प्रदर्शन इस दिशा में एक सकारात्मक तस्वीर पेश करता है। लेकिन इस तस्वीर को स्थायी बनाना अगली चुनौती है। आज जिस लखनऊ को देश में पहला स्थान मिला है, उसे आने वाले वर्षों में भी अपनी हवा को स्वच्छ बनाए रखना होगा। दूसरे शहरों को भी अपनी रैंकिंग सुधारने के साथ वास्तविक वायु गुणवत्ता में सुधार सुनिश्चित करना होगा।


