शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में आंधी, बारिश और आकाशीय बिजली का कहर कोई नई घटना नहीं है। हर वर्ष मानसून और प्री-मानसून के दौरान दर्जनों लोग जान गंवाते हैं, पशुधन नष्ट होता है और किसानों की फसलें बर्बाद हो जाती हैं। लेकिन इस बार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तत्परता के साथ जनहानि, पशुहानि और आर्थिक नुकसान का संज्ञान लिया है, उसने प्रशासनिक तंत्र के सामने एक स्पष्ट संदेश रख दिया है कि राहत कार्यों में देरी अब स्वीकार नहीं होगी।
मुख्यमंत्री का यह निर्देश कि प्रभावित परिवारों को 24 घंटे के भीतर मुआवजा उपलब्ध कराया जाए, केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं बल्कि शासन की संवेदनशीलता की कसौटी भी है। अक्सर देखा गया है कि आपदा के बाद राहत और मुआवजे की फाइलें तहसीलों, ब्लॉकों और जिलों के कार्यालयों में महीनों तक घूमती रहती हैं। पीड़ित परिवार सरकारी सहायता की प्रतीक्षा करते-करते थक जाता है। ऐसे में 24 घंटे की समयसीमा प्रशासनिक जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि सवाल केवल मुआवजा बांटने का नहीं है। असली चुनौती यह है कि क्या प्रशासन आपदा से पहले तैयारी कर पा रहा है? हर वर्ष आकाशीय बिजली से बड़ी संख्या में मौतें होती हैं। मौसम विभाग की चेतावनियों और आधुनिक तकनीक के बावजूद यदि ग्रामीण क्षेत्रों तक समय रहते सूचना नहीं पहुंचती तो इसका अर्थ है कि हमारी आपदा प्रबंधन प्रणाली में अभी भी गंभीर कमियां मौजूद हैं।
प्रदेश के किसानों के लिए यह समय और भी कठिन है। कई जिलों में कटाई के बाद खेतों में पड़ी फसलें बारिश से बर्बाद हुई हैं। मक्का, मूंगफली, सब्जियों और अन्य फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। किसान पहले से बढ़ती लागत, महंगे बीज और मौसम की अनिश्चितता से जूझ रहा है। ऐसे में फसल नुकसान का सर्वे केवल कागजी औपचारिकता नहीं होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि सर्वेक्षण पारदर्शी हो और वास्तविक किसानों तक राहत पहुंचे।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को फील्ड में उतरने का निर्देश दिया है। यह निर्देश स्वागत योग्य है, क्योंकि आपदा की वास्तविक तस्वीर वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर नहीं समझी जा सकती। जब जिलाधिकारी, तहसीलदार और अन्य अधिकारी गांवों में पहुंचेंगे, तभी पीड़ितों की वास्तविक समस्याएं सामने आएंगी। प्रशासन की मौजूदगी पीड़ित परिवारों में भरोसा भी पैदा करती है कि सरकार उनके साथ खड़ी है।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह बचना संभव नहीं है, लेकिन नुकसान को कम करना जरूर संभव है। इसके लिए मजबूत आपदा प्रबंधन तंत्र, त्वरित राहत व्यवस्था, मौसम चेतावनी प्रणाली और प्रशासनिक जवाबदेही आवश्यक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सख्त निर्देश देकर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। अब निगाहें उन अधिकारियों पर हैं जिन्हें इन आदेशों को जमीन पर उतारना है।
आपदा के समय सरकार की पहचान उसके भाषणों से नहीं बल्कि राहत की गति से होती है। यदि प्रभावित परिवारों को समय पर सहायता, किसानों को उचित मुआवजा और पीड़ितों को तत्काल राहत मिलती है, तभी यह कहा जा सकेगा कि शासन ने अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन किया है। वरना हर वर्ष की तरह आंकड़े बदल जाएंगे, लेकिन पीड़ा और शिकायतें वही रह जाएंगी।


