शरद कटियार
भारतीय राजनीति में पिछले एक दशक से “युवा नेतृत्व” सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाला राजनीतिक शब्द बन चुका है। लगभग हर दल अपने संगठन में युवाओं को स्थान देने, नई पीढ़ी को आगे लाने और भविष्य की राजनीति युवाओं के हाथों में सौंपने का दावा करता है। लेकिन जब वास्तविक अधिकारों की बात आती है तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है। बड़े पद तो मिल जाते हैं, लेकिन बड़े फैसले नहीं। जिम्मेदारियां तो सौंप दी जाती हैं, लेकिन अधिकार नहीं।
यदि किसी युवा नेता को राष्ट्रीय समन्वयक, राष्ट्रीय अध्यक्ष, कार्यकारी अध्यक्ष या उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है, तो स्वाभाविक रूप से जनता और कार्यकर्ताओं की अपेक्षा होती है कि वह पार्टी के महत्वपूर्ण निर्णयों में भी भागीदार होगा। लेकिन यदि उसे केवल मंच से भाषण देने, रैलियां करने, सोशल मीडिया अभियान चलाने और कार्यकर्ताओं से संवाद तक सीमित रखा जाए, जबकि उम्मीदवारों के चयन, टिकट वितरण और रणनीतिक फैसलों का अधिकार पूरी तरह पुराने नेतृत्व के पास ही रहे, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाया जा रहा है या केवल उसका चेहरा इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह स्थिति किसी एक दल तक सीमित नहीं है। देश की अधिकांश राजनीतिक पार्टियों में यही तस्वीर देखने को मिलती है। युवाओं को संगठन में स्थान मिलता है, लेकिन संगठन चलाने की स्वतंत्रता नहीं। उन्हें भविष्य का नेता बताया जाता है, लेकिन वर्तमान में निर्णय लेने योग्य नहीं माना जाता। इससे राजनीति में आने वाले लाखों युवाओं के बीच यह संदेश जाता है कि मेहनत और योग्यता से अधिक महत्वपूर्ण विरासत और शीर्ष नेतृत्व की इच्छा है।
लोकतंत्र में नेतृत्व परिवर्तन एक स्वाभाविक प्रक्रिया होनी चाहिए। नई पीढ़ी नए विचार, नई तकनीक, नई सोच और बदलते समाज की अपेक्षाओं को बेहतर ढंग से समझती है। आज का युवा रोजगार, शिक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दों पर सोचता है। यदि उसे निर्णय प्रक्रिया से दूर रखा जाएगा तो राजनीति भी पुराने ढर्रे पर चलती रहेगी।
अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता, लेकिन अनुभव और अधिकार का संतुलन भी आवश्यक है। वरिष्ठ नेताओं का मार्गदर्शन अमूल्य है, परंतु यदि हर अंतिम निर्णय उन्हीं के हाथ में रहेगा तो अगली पीढ़ी नेतृत्व करना कब सीखेगी? नेतृत्व केवल भाषणों से नहीं बनता, बल्कि कठिन निर्णय लेने, जिम्मेदारी उठाने और परिणामों का सामना करने से तैयार होता है।
राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि युवा नेतृत्व का अर्थ केवल मंच पर युवा चेहरा खड़ा कर देना नहीं है। वास्तविक सशक्तिकरण तब होगा जब युवाओं को टिकट चयन, संगठन विस्तार, चुनावी रणनीति और नीतिगत निर्णयों में भी समान भागीदारी मिले। अन्यथा “युवा राजनीति” का नारा केवल चुनावी पोस्टरों और भाषणों तक सीमित रह जाएगा।
आखिरकार प्रश्न केवल किसी एक नेता या एक दल का नहीं है। प्रश्न उस राजनीतिक संस्कृति का है, जहां युवाओं से ऊर्जा तो ली जाती है, लेकिन अधिकार नहीं दिए जाते। यदि देश की राजनीति को वास्तव में नई दिशा देनी है तो युवाओं पर भरोसा भी करना होगा। वरना हर चुनाव में “युवा नेतृत्व” का नारा गूंजेगा, लेकिन फैसलों की कलम हमेशा पुरानी पीढ़ी के हाथों में ही रहेगी।


