शरद कटियार
भारत दुनिया का सबसे युवा देश कहलाता है। आंकड़े बताते हैं कि देश की करीब 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। हर साल लाखों छात्र डिग्रियां लेकर रोजगार बाजार में उतरते हैं। कोई रेलवे की तैयारी करता है, कोई एसएससी की, कोई पीसीएस -आईपीएस बनने का सपना देखता है तो कोई फौज में भर्ती होकर देश सेवा करना चाहता है। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि यही युवा आज सबसे ज्यादा उपेक्षित, सबसे ज्यादा परेशान और सबसे ज्यादा अपमानित महसूस कर रहा है।
देश का बेरोजगार युवा आज सिर्फ नौकरी के लिए नहीं लड़ रहा, वह व्यवस्था से लड़ रहा है। वह पेपर लीक से लड़ रहा है। वह भ्रष्ट भर्ती तंत्र से लड़ रहा है। वह उन नेताओं और अफसरों से लड़ रहा है जिन्होंने युवाओं को सिर्फ चुनावी पोस्टर और रैली की भीड़ समझ रखा है।
जब पढ़े-लिखे युवाओं को “कॉकरोच” जैसी उपमाओं से जोड़ने वाली बहसें सामने आती हैं तो यह सिर्फ शब्दों का विवाद नहीं होता, यह उस पूरी पीढ़ी के आत्मसम्मान पर हमला बन जाता है जो वर्षों से संघर्ष कर रही है। एक ऐसा युवा जो सुबह कोचिंग जाता है, दोपहर में लाइब्रेरी में बैठता है, रात को ऑनलाइन फॉर्म भरता है और हर परीक्षा में नए घोटाले की खबर सुनकर टूट जाता है,उसे अगर व्यवस्था सम्मान भी न दे सके तो यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।
आज भारत का सबसे बड़ा संकट सिर्फ बेरोजगारी नहीं, बल्कि युवाओं में बढ़ती निराशा है। सरकारी आंकड़े चाहे जो कहें, लेकिन जमीन पर हकीकत यह है कि लाखों पद वर्षों से खाली पड़े हैं। भर्ती कैलेंडर समय पर नहीं आते। परीक्षाएं होती हैं तो पेपर लीक हो जाता है। रिजल्ट आते हैं तो कोर्ट केस शुरू हो जाते हैं। और इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा बर्बाद होता है देश का गरीब और मध्यम वर्गीय युवा।
विडंबना देखिए कि जिस युवा के टैक्स, मेहनत, वोट और संघर्ष से पूरा लोकतंत्र खड़ा है, उसी को बार-बार अपमानित होने का एहसास कराया जाता है। आज देश में ऐसे हजारों उदाहरण हैं जहां अयोग्य लोग सत्ता और पदों पर बैठे हैं, जबकि योग्य युवा बेरोजगारी में जिंदगी काट रहा है। यह सिर्फ आर्थिक असमानता नहीं, यह सामाजिक अन्याय भी है।
देश का युवा “कॉकरोच” नहीं हो सकता। कॉकरोच वह व्यवस्था हो सकती है जो भ्रष्टाचार में जीवित रहती है। कॉकरोच वह राजनीति हो सकती है जो जनता के असली मुद्दों से भागती है। कॉकरोच वह तंत्र हो सकता है जो हर भर्ती में घोटाले पैदा करता है। लेकिन वह युवा नहीं, जो अपने बूढ़े पिता की उम्मीदों के लिए दिन-रात पढ़ रहा है।
युवा इस देश की नींव है। अगर वही टूट गया तो भारत का भविष्य भी हिल जाएगा। यही युवा सेना में जाकर सीमा बचाता है, यही स्टार्टअप बनाकर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाता है, यही खेत में किसान का हाथ बनता है, यही फैक्ट्री में मजदूर बनकर उत्पादन करता है। और यही युवा चुनाव के समय लोकतंत्र को जिंदा रखता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भारत का राजनीतिक विमर्श युवाओं के असली मुद्दों से इतना दूर क्यों होता जा रहा है? क्यों रोजगार की जगह धर्म बहस का विषय बन जाता है? क्यों शिक्षा की जगह नफरत पर राजनीति होती है? क्यों भर्ती घोटालों पर संसद में उतनी आवाज नहीं उठती जितनी चुनावी नारों पर उठती है?
अब देश का युवा बदल रहा है। वह समझ चुका है कि सिर्फ भावनात्मक नारों से उसका भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। उसे नौकरी चाहिए, पारदर्शिता चाहिए, सम्मान चाहिए और अवसर चाहिए। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर अब युवा खुलकर सवाल पूछ रहा है। वह पूछ रहा है कि आखिर डिग्री लेने के बाद भी नौकरी क्यों नहीं? भर्ती परीक्षा सुरक्षित क्यों नहीं? और सत्ता में बैठे लोग युवाओं को गंभीरता से क्यों नहीं लेते?
भारत का भविष्य किसी जाति या धर्म की लड़ाई से तय नहीं होगा। भारत का भविष्य उस युवा से तय होगा जिसे आज रोजगार नहीं मिल रहा। जिस दिन यह युवा पूरी ताकत से अपने अधिकारों के लिए खड़ा हो गया, उस दिन राजनीति की दिशा बदल जाएगी।
युवाओं को अपमानित करके कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकती। इतिहास गवाह है कि जब भी युवाओं का धैर्य टूटा है, तब बड़े-बड़े सिंहासन हिले हैं। अब समय आ गया है कि देश की राजनीति युवाओं को भीड़ नहीं, शक्ति माने। क्योंकि यह वही पीढ़ी है जो भारत का नया इतिहास लिखेगी।“नौकरी मांगना अपराध नहीं,युवाओं का सम्मान लोकतंत्र की पहली शर्त है।”


