लखनऊ/फर्रुखाबाद। उत्तर प्रदेश के किसानों, खासकर आलू उत्पादकों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। महंगी लागत, बढ़ते कर्ज और बाजार में गिरते दामों के बीच किसान बुरी तरह फंस गए हैं। इसी गंभीर हालात को लेकर फर्रुखाबाद के किसान प्रतिनिधि अशोक कटियार ने मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर हरियाणा की तर्ज पर “भावांतर भरपाई योजना” लागू करने की मांग उठाई है, जिसने प्रदेश की कृषि नीति पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा आलू उत्पादक राज्य है, जहां कुल राष्ट्रीय उत्पादन का लगभग 35 प्रतिशत हिस्सा पैदा होता है। भारत विश्व में करीब 60 मिलियन मीट्रिक टन आलू उत्पादन के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन 93 मिलियन मीट्रिक टन के साथ पहले स्थान पर है। लेकिन विडंबना यह है कि इतनी बड़ी हिस्सेदारी के बावजूद किसानों को उनकी उपज का वाजिब मूल्य नहीं मिल पा रहा। फर्रुखाबाद, जो प्रदेश में आलू उत्पादन का प्रमुख केंद्र माना जाता है, वहां के किसान सबसे ज्यादा संकट झेल रहे हैं।
स्थिति यह है कि उत्पादन लागत—बीज, खाद, सिंचाई, भंडारण और मजदूरी—लगातार बढ़ रही है, जबकि मंडियों में आलू के दाम कई बार लागत से भी नीचे चले जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में उत्पादित आलू का केवल 1 प्रतिशत निर्यात होता है और मात्र 1 प्रतिशत ही खाद्य प्रसंस्करण में इस्तेमाल होता है। यानी 98 प्रतिशत उत्पादन सीधे बाजार पर निर्भर है, जहां कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव किसानों को बर्बादी के कगार पर ला देता है।
इसी संकट का समाधान बताते हुए अशोक कटियार ने हरियाणा सरकार की “भावांतर भरपाई योजना” का उदाहरण दिया है। इस योजना के तहत यदि मंडी में फसल का बाजार मूल्य तय सुरक्षित मूल्य से नीचे चला जाता है, तो सरकार उस अंतर की भरपाई सीधे किसानों के खाते में करती है। हरियाणा में यह योजना 21 बागवानी फसलों—फल, सब्जी और मसालों—पर लागू है और किसानों को गिरती कीमतों से राहत दे रही है।
पत्र में यह भी बताया गया कि योजना के अंतर्गत किसानों को “मेरी फसल मेरा ब्योरा” पोर्टल पर पंजीकरण करना होता है, जिसके बाद बागवानी विभाग सत्यापन करता है। मंडी में बिक्री के समय मिलने वाले गेट पास और जे-फॉर्म के आधार पर सरकार अंतर राशि सीधे खाते में भेजती है, जिससे पारदर्शिता बनी रहती है और बिचौलियों की भूमिका खत्म होती है।
फर्रुखाबाद समेत पूरे उत्तर प्रदेश में आलू, टमाटर, मटर, आम और अमरूद जैसी फसलों के किसानों को हर साल भारी नुकसान झेलना पड़ता है। ऐसे में “भावांतर भरपाई योजना” को लागू करना किसानों के लिए जीवन रेखा साबित हो सकता है।
जमीनी हकीकत यह है कि किसान कर्ज लेकर खेती करता है, लेकिन जब उपज बेचने जाता है तो उसे लागत भी नहीं मिलती। नतीजा—कर्ज का बोझ, आर्थिक तंगी और कई मामलों में आत्महत्या तक की नौबत। यही वजह है कि अब किसान और सामाजिक संगठन सरकार से ठोस नीति की मांग कर रहे हैं।


