शरद कटियार
सरकारी तंत्र में जवाबदेही की बात अक्सर फाइलों और बैठकों तक सीमित रह जाती है, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राजस्व न्यायालयों के कामकाज को लेकर जिस तरह की कार्रवाई शुरू की है, उससे यह स्पष्ट संकेत गया है कि अब लंबित मामलों को टालना अधिकारियों के लिए आसान नहीं होगा। राजस्व मामलों के समयबद्ध निस्तारण में अपेक्षित प्रगति न मिलने पर पांच तहसीलदारों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया है, जबकि 13 तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।
यह कार्रवाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से राजस्व न्यायालयों में लंबित वादों की स्थिति की उच्चस्तरीय समीक्षा के बाद दिए गए निर्देशों के क्रम में की गई है। सरकार का स्पष्ट संदेश है कि राजस्व मामलों में देरी केवल प्रशासनिक आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर किसान, भूमिधर और आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है।
राजस्व न्यायालयों में भूमि, नामांतरण और अन्य राजस्व संबंधी विवाद वर्षों तक लंबित रहने से आम नागरिक को आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। जमीन से जुड़ा विवाद किसी परिवार की संपत्ति, खेती, रोजगार और भविष्य तक को प्रभावित कर सकता है। ऐसे में किसी अधिकारी की उदासीनता महज सरकारी काम में देरी नहीं, बल्कि नागरिक को मिलने वाले न्याय में विलंब बन जाती है।
इसी दृष्टिकोण से सरकार ने 7 सितंबर को प्रदेश के सभी राजस्व न्यायालयों में उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा-34 के तहत दाखिल वादों की तहसीलवार और अधिकारीवार समीक्षा कराई। समीक्षा में जहां काम की गति संतोषजनक नहीं मिली, वहां जिम्मेदारी तय करते हुए कार्रवाई की गई।
राजस्व मामलों के निस्तारण में लापरवाही के आरोप में निलंबित किए गए अधिकारियों में अमित यादव, तहसीलदार संडीला, हरदोई; कृष्ण कुमार मिश्रा, तहसीलदार देवरिया; सौरभ कुमार, तहसीलदार जौनपुर; रंजन वर्मा, तत्कालीन नायब तहसीलदार अयोध्या एवं वर्तमान तहसीलदार गाजीपुर तथा अलख शुक्ला, तहसीलदार प्रतापगढ़ शामिल हैं।
सरकार की कार्रवाई यहीं नहीं रुकी है। इससे पहले 1 सितंबर 2026 को भी चार तहसीलदारों और एक नायब तहसीलदार के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की जा चुकी है। लगातार हो रही कार्रवाई से यह संकेत साफ है कि शासन राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली को लेकर अब केवल समीक्षा तक सीमित रहने के बजाय परिणाम आधारित जवाबदेही लागू करने के मूड में है।
लापरवाही के मामलों में 13 तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। इनमें चंद्रशेखर वर्मा, गोपाल जी, रविरंजन कश्यप, राकेश कुमार, कविता ठाकुर, देवानन्द तिवारी, स्नेहल वर्मा, राहुल सिंह, अनिल कुमार, यजुवेन्द्र सिंह, सुखवीर सिंह, रमाशंकर मिश्रा और शार्द सिंह शामिल हैं।
इन अधिकारियों से उनकी कार्यप्रणाली और लंबित वादों के अपेक्षित निस्तारण न होने के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया है। राजस्व परिषद ने इनके खिलाफ नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है।
सरकार की यह कार्रवाई इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजस्व न्यायालयों में लंबित मामलों की समस्या केवल अधिकारियों की संख्या या अदालतों की संख्या बढ़ाने से समाप्त नहीं होगी। इसके लिए यह भी जरूरी है कि हर स्तर पर यह तय हो कि कौन-सा मामला किस अधिकारी के पास लंबित है, कितने समय से लंबित है और उसके निस्तारण में देरी का वास्तविक कारण क्या है।
तकनीकी व्यवस्था, ऑनलाइन निगरानी और नियमित समीक्षा तभी प्रभावी साबित होगी, जब उसके आधार पर जिम्मेदारी भी तय हो। केवल आंकड़ों में निस्तारण बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; जरूरी यह है कि नागरिक को वास्तविक और गुणवत्तापूर्ण न्याय मिले।
योगी सरकार ने इस कार्रवाई के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की है कि प्रशासनिक जिम्मेदारी से बचने की गुंजाइश कम होती जा रही है। मुख्यमंत्री की समीक्षा के बाद राजस्व परिषद ने अधिकारियों के कामकाज पर निगरानी बढ़ाने का फैसला किया है और स्पष्ट किया है कि अपेक्षित प्रगति नहीं मिलने पर आगे भी कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई की सफलता का आकलन केवल निलंबन की संख्या से नहीं, बल्कि उसके बाद व्यवस्था में आने वाले सुधार से होना चाहिए। यदि कार्रवाई के परिणामस्वरूप लंबित वाद तेजी से निस्तारित होते हैं, तारीखों का अनावश्यक सिलसिला कम होता है और किसानों तथा आम नागरिकों को समय पर राहत मिलती है, तभी यह अभियान अपने वास्तविक उद्देश्य तक पहुंचेगा।
राजस्व विवादों में वर्षों तक चलने वाली प्रक्रिया आम आदमी के लिए किसी सजा से कम नहीं होती। एक तरफ जमीन विवाद का तनाव, दूसरी तरफ कार्यालयों और न्यायालयों के चक्कर—यह स्थिति नागरिक के भरोसे को कमजोर करती है। इसलिए सरकार का यह रुख स्वागत योग्य है कि राजस्व न्यायालयों में लंबित मामलों को केवल सरकारी आंकड़ा मानकर नहीं छोड़ा जाएगा।
अब जरूरत इस बात की है कि निलंबन और नोटिस की कार्रवाई के साथ-साथ व्यवस्था में स्थायी सुधार भी सुनिश्चित किया जाए। अधिकारियों के लिए स्पष्ट लक्ष्य हों, मामलों की नियमित निगरानी हो, अनावश्यक स्थगन पर नियंत्रण हो और प्रत्येक लंबित मामले की जिम्मेदारी तय हो।
राजस्व न्यायालयों में न्याय जितनी जल्दी और पारदर्शी तरीके से आम नागरिक तक पहुंचेगा, शासन की जवाबदेही और प्रशासन पर जनता का भरोसा उतना ही मजबूत होगा। सरकार की मौजूदा कार्रवाई इसी दिशा में एक सख्त शुरुआत मानी जा सकती है।


