यौन अपराध मामलों में सभी अदालतों को संवेदनशीलता से सुनवाई के निर्देश
नई दिल्ली। यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए पटना हाईकोर्ट की एक टिप्पणी पर गंभीर नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में अदालतों को कानून की भावना, पीड़िता के अधिकारों और पूर्व में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों को ध्यान में रखकर फैसला देना चाहिए। साथ ही सभी उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ अदालतों और पुलिस अधिकारियों को यौन अपराधों से संबंधित मामलों में जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया गया है।
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उठाया गया कि पटना हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा था कि किसी महिला की सलवार उतारना और उसकी छाती दबाना अपने आप में दुष्कर्म के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस टिप्पणी पर सर्वोच्च न्यायालय ने नाराजगी जताते हुए कहा कि न्यायाधीशों को ऐसे मामलों में पहले से जारी फैसलों और न्यायिक दिशानिर्देशों का अध्ययन करना चाहिए तथा पूरी संवेदनशीलता के साथ निर्णय देना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने निर्देश दिया कि यौन अपराधों में न्यायिक संवेदनशीलता पर राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की तैयार रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट और सभी उच्च न्यायालयों की वेबसाइट पर उपलब्ध कराई जाए। साथ ही सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया कि पुलिस थानों में प्राथमिकी दर्ज करने और आरोपपत्र दाखिल करने के दौरान भी इस मार्गदर्शिका का पालन सुनिश्चित किया जाए।
दरअसल, यह मामला वर्ष 2008 की एक घटना से जुड़ा है। आरोप के अनुसार एक युवती अपने पिता के साथ फोटो खिंचवाने स्टूडियो गई थी। वहां स्टूडियो संचालक ने पिता को बाहर भेजकर दरवाजा बंद कर लिया और युवती के साथ जबरन अशोभनीय हरकत करने का प्रयास किया। युवती के शोर मचाने पर आरोपी मौके से भाग गया। निचली अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास सहित अन्य धाराओं में दोषी ठहराया था।
बाद में पटना हाईकोर्ट ने साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए दुष्कर्म के प्रयास की सजा को निरस्त कर दिया और कहा कि उपलब्ध साक्ष्य इस आरोप को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हालांकि अदालत ने आरोपी को महिला की मर्यादा भंग करने का दोषी माना। इसी टिप्पणी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठे, जिस पर शीर्ष अदालत ने कड़ी प्रतिक्रिया दी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में न्यायिक अधिकारियों, पुलिस और अभियोजन एजेंसियों को संवेदनशीलता, कानूनी सिद्धांतों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय-समय पर जारी दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन करना होगा, ताकि पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और निष्पक्ष बन सके।


