संपादकीय |
दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला पीजी इमारत का अचानक ढह जाना केवल एक भवन के गिरने की घटना नहीं है। यह राजधानी में इमारतों की सुरक्षा, निर्माण कार्यों की निगरानी और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े करता है। मलबे से लगातार शवों का बरामद होना और कई लोगों का घायल होना इस हादसे की गंभीरता को सामने रखता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि घटना उस समय हुई जब इमारत में मजदूरों के साथ छात्र भी मौजूद थे। यानी जिस स्थान को लोगों के रहने और काम करने के लिए सुरक्षित होना चाहिए था, वही अचानक उनके लिए जानलेवा संकट में बदल गया।
बताया गया है कि करीब 40 साल पुरानी यह इमारत रविवार दोपहर लगभग 1:30 बजे कुछ ही सेकंड में मलबे में बदल गई। इतनी बड़ी इमारत का अचानक गिर जाना अपने आप में कई सवाल पैदा करता है। स्थानीय लोगों के अनुसार बेसमेंट में करीब सात दिनों से तोड़फोड़ और खुदाई का काम चल रहा था। बेसमेंट में पानी भरे होने और ढांचे के पहले से कमजोर होने की बात भी सामने आई है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि खुदाई के दौरान किसी पिलर पर असर पड़ा होगा। हालांकि हादसे की वास्तविक वजह जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगी, लेकिन इस घटना ने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि क्या किसी पुरानी और बहुमंजिला इमारत में संरचनात्मक बदलाव से पहले सुरक्षा मानकों की पर्याप्त जांच की गई थी?
दिल्ली जैसे महानगर में जमीन की कीमत और जगह की कमी के कारण पुरानी इमारतों में लगातार निर्माण, मरम्मत, पुनर्गठन और बेसमेंट से जुड़े काम होते रहते हैं। ऐसे कार्यों में छोटी-सी तकनीकी गलती भी बड़े खतरे में बदल सकती है। इसलिए यह जरूरी है कि किसी पुरानी इमारत में तोड़फोड़ या खुदाई शुरू करने से पहले उसके ढांचे की विशेषज्ञों से जांच हो। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि निर्माण या तोड़फोड़ के दौरान आसपास रहने वाले लोगों और काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम मौजूद हों। यदि नियम केवल कागजों पर हैं और मौके पर उनकी निगरानी नहीं होती तो दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने का सवाल हमेशा अधूरा रह जाता है।
इस हादसे के बाद बचाव दल ने जिस तरह रातभर अभियान चलाया, वह सराहनीय है। जेसीबी और अन्य मशीनों के साथ कैमरों तथा खोजी कुत्तों की मदद से मलबे में लोगों की तलाश की जा रही है। ऐसे अभियानों में एक-एक कदम बेहद सावधानी से उठाना पड़ता है, क्योंकि मलबे के भीतर संभावित रूप से फंसे लोगों की सुरक्षा के साथ-साथ बचावकर्मियों की सुरक्षा भी महत्वपूर्ण होती है। लेकिन सवाल यह है कि हमारी व्यवस्था इतनी सक्रिय केवल हादसा होने के बाद ही क्यों दिखाई देती है? क्या ऐसी इमारतों की पहचान और निगरानी पहले से नहीं की जा सकती?
हादसे के बाद इमारत मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है और उसे पकड़ने के लिए पुलिस टीमों का गठन किया गया है। यह कार्रवाई कानून की प्रक्रिया का हिस्सा है और यदि जांच में किसी की लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। लेकिन केवल किसी एक व्यक्ति को आरोपी बनाकर मामला समाप्त कर देना पर्याप्त नहीं होगा। जांच का दायरा उन सभी स्तरों तक जाना चाहिए जहां सुरक्षा संबंधी अनुमति, निरीक्षण, निर्माण कार्य और भवन की स्थिति की निगरानी से जुड़े सवाल उठते हैं। यदि कहीं नियमों की अनदेखी हुई है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है।
मुख्यमंत्री द्वारा मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए जाना भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मगर किसी भी जांच की वास्तविक उपयोगिता उसकी रिपोर्ट से अधिक उसके बाद होने वाली कार्रवाई में होती है। यदि जांच में कमियां सामने आती हैं और फिर भी व्यवस्था में सुधार नहीं होता तो ऐसी जांच केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। इसलिए सत्य निकेतन हादसे की जांच को केवल इस घटना तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसके माध्यम से राजधानी में पुरानी और जोखिम वाली इमारतों की व्यापक समीक्षा का रास्ता भी तैयार होना चाहिए।
आसपास की एक इमारत में दरारें मिलने के बाद उसे खाली कराकर लोहे के जैक और सपोर्ट पिलर लगाए जाने की कार्रवाई बताती है कि समस्या केवल एक भवन तक सीमित हो सकती है, ऐसा मान लेना जल्दबाजी होगी। यदि एक इमारत के गिरने के बाद आसपास की दूसरी इमारतों की सुरक्षा जांच की जरूरत महसूस होती है तो यह सवाल स्वाभाविक है कि ऐसी जांच नियमित रूप से पहले क्यों नहीं होती? राजधानी के पुराने इलाकों में रहने वाले लोगों को हर बारिश, हर खुदाई या हर निर्माण गतिविधि के समय अपने भवन की सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल उन आंकड़ों से उठता है जिनके अनुसार 2022 से 2025 के बीच दिल्ली में इमारत गिरने की 1133 घटनाएं सामने आईं और इनमें 98 लोगों की जान गई। इतने बड़े आंकड़े को महज दुर्घटनाओं की सूची मानकर आगे बढ़ जाना गंभीर भूल होगी। यह एक व्यवस्थित चेतावनी है कि भवन सुरक्षा को लेकर राजधानी में दीर्घकालिक नीति और प्रभावी निगरानी की आवश्यकता है। हर हादसे के बाद कुछ दिन तक कार्रवाई, जांच और चेतावनी की खबरें आती हैं, लेकिन असली परीक्षा यह है कि अगले हादसे को रोकने के लिए क्या बदला गया।
दिल्ली में हजारों परिवार, छात्र, किरायेदार और मजदूर ऐसी इमारतों में रहते या काम करते हैं जिनकी संरचनात्मक स्थिति उनके लिए आसानी से जांच पाना संभव नहीं है। आम नागरिक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह खुद यह तय कर ले कि कोई पिलर कितना मजबूत है या बेसमेंट में खुदाई से भवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके लिए विशेषज्ञ संस्थाएं, स्थानीय निकाय और प्रशासनिक तंत्र मौजूद हैं। इसलिए भवन सुरक्षा को केवल भवन मालिक की निजी जिम्मेदारी मानना भी उचित नहीं होगा। जहां सार्वजनिक सुरक्षा का सवाल हो, वहां नियामक संस्थाओं की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है।


