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Saturday, August 8, 2026

पीडीए की बदली परिभाषा या पिछड़ों के संग धोखा? नारे वही, अर्थ नए…

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शरद कटियार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में नारे केवल शब्द नहीं होते, वे विचारधारा का आईना भी माने जाते हैं। लेकिन जब किसी नारे की परिभाषा समय-समय पर बदलने लगे, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या विचारधारा बदल रही है या केवल चुनावी गणित?

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का हालिया बयान “जबसे पीडीए से वो लोग हारे हैं तबसे पीडीए की नई परिभाषा बना रहे हैं, पीडीए में पी से पंडित भी है।”राजनीतिक गलियारों में नई बहस का कारण बन गया है।

जब पीडीए का नारा सामने आया था, तब इसे व्यापक रूप से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रतीक के रूप में देखा गया।चुनाव आने की आहट से ब्राह्मण को रिझाने के लिय अब यदि उसी अवधारणा में “पीड़ित पंडित” को भी शामिल करने की बात कही जा रही है, तो यह स्वाभाविक है कि जनता पूछे क्या यह सामाजिक न्याय का विस्तार है या चुनावी समीकरणों का पुनर्गठन? या फिर पिछड़ों को पहले धोखे से जोड़ वोट लेने की जुगाड़ अथवा वादा खिलाफ़ी, वो भी चुनाव से पहले ही।
राजनीति में परिवर्तन बुरा नहीं है। समाज बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं और रणनीतियाँ भी बदलती हैं। लेकिन यदि परिवर्तन के पीछे स्पष्ट वैचारिक आधार न दिखे और वह केवल चुनावों के आसपास दिखाई दे, तो जनता उसे सहज रूप से स्वीकार नहीं करती।
आज सवाल केवल ‘पी’ के अर्थ का नहीं है। सवाल उस भरोसे का है, जिसके आधार पर करोड़ों लोगों ने किसी राजनीतिक नारे को स्वीकार किया। यदि एक ही नारे की व्याख्या अलग-अलग समय पर अलग-अलग रूप में की जाएगी, तो स्वाभाविक रूप से मतदाता यह सोचने पर मजबूर होगा कि मूल विचार क्या था और अब उसमें बदलाव क्यों आवश्यक हो गया? अखिलेश यादव को उनके पिता प्रख्यात राजनैतिक धुरंधर और पिछड़ों के सच्चे हिमायती नेता जी मुलायम सिंह ने उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य का मुख्यमंत्री बनाया था, और पिछड़ों के हित मे बनाई गईं विश्व की सबसे बड़ी पार्टी की कमान भी अधूरे मन से सौपी थी, ज़ो आज केवल अखिलेश और उनकी पत्नी डिम्पल और संभावित आहट के बीच उनकी बेटी तक सिमटते हुए रह चुकी है और धीरे धीरे पार्टी की समाजवादी विचारधारा भी विलुप्त होती दिखने लगी है, ज़ो एक बड़े परिवर्तन की तरफ इशारा कर रही है।
राजनीति के जानकारों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की बदलती सामाजिक और चुनावी परिस्थितियों में हर दल नए सामाजिक समूहों तक पहुंचने का प्रयास कर रहा है। कोई पिछड़ों को साध रहा है, कोई दलितों को, कोई ब्राह्मणों को, तो कोई युवाओं और महिलाओं को। इसमें कोई बुराई नहीं है। लोकतंत्र में हर वर्ग तक पहुंचना राजनीतिक दलों का अधिकार भी है और दायित्व भी। लेकिन यदि यह प्रयास केवल चुनावी मौसम में दिखाई दे, तो उस पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
प्रदेश का मतदाता अब पहले जैसा नहीं रहा। वह केवल जातीय पहचान के आधार पर मतदान करने के बजाय विकास, रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और शासन की गुणवत्ता को भी महत्व देता है। इसलिए केवल नए नारे गढ़ना या पुराने नारों की नई व्याख्या करना पर्याप्त नहीं होगा।
राजनीतिक दलों को यह भी याद रखना चाहिए कि जनता की स्मृति बहुत कमजोर नहीं होती। उसे याद रहता है कि किस दल ने कब क्या कहा था और आज क्या कह रहा है। इसलिए वैचारिक निरंतरता किसी भी दल की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी होती है।
यदि पीडीए का अर्थ वास्तव में अब हर पीड़ित तक पहुंचना है, तो फिर यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। इसकी झलक संगठन, टिकट वितरण, नीतियों और राजनीतिक व्यवहार में भी दिखाई देनी चाहिए। अन्यथा विरोधियों को इसे चुनावी अवसरवाद बताने का अवसर मिलता रहेगा।
लोकतंत्र में नारे जनता को आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन विश्वास केवल आचरण से बनता है। राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि बदलते शब्दों से अधिक महत्व बदलती नीतियों और उनके परिणामों का है।

आज जनता का सबसे बड़ा प्रश्न यही है,क्या राजनीति समाज को जोड़ने के लिए बदली जा रही है या केवल वोटों का नया गणित बनाने के लिए? इसका उत्तर किसी भाषण में नहीं, बल्कि राजनीतिक दलों के कार्यों और उनके निर्णयों में मिलेगा।
लोकतंत्र में जनता ही सबसे बड़ी निर्णायक है। वह नारे भी सुनती है, उनके अर्थ भी समझती है और समय आने पर अपना फैसला भी सुनाती है।

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