भारत को वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में केंद्र सरकार का नवीनतम निर्णय केवल एक कर राहत नहीं, बल्कि दीर्घकालिक औद्योगिक रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में प्रयुक्त कई मशीनों और महत्वपूर्ण पुर्जों पर सीमा शुल्क समाप्त करने का फैसला यह स्पष्ट संकेत देता है कि सरकार अब भारत को केवल उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि विश्वस्तरीय उत्पादन केंद्र के रूप में स्थापित करना चाहती है।
बीते एक दशक में भारत ने मोबाइल फोन निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। कभी अधिकांश मोबाइल फोन आयात करने वाला देश आज दुनिया के प्रमुख मोबाइल उत्पादक देशों में शामिल हो चुका है। अब सरकार की नजर इलेक्ट्रॉनिक्स के उन मूलभूत क्षेत्रों पर है, जहां अभी भी विदेशी मशीनों और तकनीक पर बड़ी निर्भरता बनी हुई है। यही कारण है कि लिथियम-आयन बैटरी, डिस्प्ले निर्माण और वायरलेस चार्जिंग तकनीक से जुड़ी मशीनों एवं पुर्जों पर सीमा शुल्क समाप्त किया गया है।
सबसे बड़ा लाभ बैटरी उद्योग को मिलने वाला है। भविष्य इलेक्ट्रिक वाहनों, ऊर्जा भंडारण और पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का है। इन सभी की आधारशिला लिथियम-आयन बैटरी है। यदि भारत बैटरी निर्माण में आत्मनिर्भर बनता है तो इसका लाभ केवल मोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ऑटोमोबाइल, सौर ऊर्जा, रक्षा और दूरसंचार जैसे अनेक क्षेत्रों को मिलेगा। उत्पादन लागत घटने से भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बनेंगे।
डिस्प्ले निर्माण में भी यह राहत महत्वपूर्ण है। आज किसी भी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद की सबसे महंगी और तकनीकी दृष्टि से जटिल इकाइयों में डिस्प्ले शामिल है। यदि भारत इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता विकसित कर लेता है तो आयात पर निर्भरता में उल्लेखनीय कमी आएगी। हालांकि सरकार ने कुछ उपभोक्ता उत्पादों के पुर्जों को इस छूट से बाहर रखा है, जिससे स्पष्ट है कि वह राजस्व और घरेलू उद्योग के बीच संतुलन बनाए रखना चाहती है।
मोबाइल फोन की वायरलेस चार्जिंग तकनीक पर दी गई सीमा शुल्क राहत भविष्य की तकनीकों को ध्यान में रखकर उठाया गया कदम है। दुनिया तेजी से वायरलेस तकनीक की ओर बढ़ रही है और भारत यदि समय रहते इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता विकसित कर लेता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में उसकी हिस्सेदारी और मजबूत होगी।
फिर भी केवल सीमा शुल्क में छूट देना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को अनुसंधान एवं विकास, सेमीकंडक्टर निर्माण, उच्च गुणवत्ता वाले तकनीकी कौशल, लॉजिस्टिक्स, बिजली आपूर्ति और वैश्विक स्तर के औद्योगिक बुनियादी ढांचे पर समान रूप से निवेश करना होगा। यदि मशीनें आयातित रहें और तकनीक भी विदेशी कंपनियों के नियंत्रण में रहे, तो वास्तविक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य अधूरा रह जाएगा।
सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इस कर राहत का वास्तविक लाभ उद्योग और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंचे। यदि उत्पादन लागत घटने के बावजूद कंपनियां कीमतों में कमी नहीं करतीं, तो इस नीति का अपेक्षित सामाजिक और आर्थिक प्रभाव सीमित रह जाएगा। प्रतिस्पर्धी बाजार, पारदर्शिता और प्रभावी निगरानी इसके लिए आवश्यक होंगे।
विश्व की बड़ी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियां चीन के विकल्प की तलाश कर रही हैं। भारत के पास जनसंख्या, बाजार, कुशल मानव संसाधन और नीतिगत स्थिरता जैसी अनेक शक्तियां हैं। यदि इनका सही उपयोग किया जाए तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बन सकता है।
सीमा शुल्क में यह राहत वास्तव में ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक निर्णायक कदम है। अब आवश्यकता इस बात की है कि यह नीति केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित न रहे, बल्कि भारत को तकनीक, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी अग्रणी स्थान दिलाने का माध्यम बने। यही इस निर्णय की वास्तविक सफलता होगी।


