अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था, विश्वास और भावनाओं का प्रतीक है। वर्षों के संघर्ष, त्याग और इंतजार के बाद निर्मित यह मंदिर देश की सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बन चुका है। ऐसे में यदि मंदिर में आने वाले चढ़ावे, दान और वित्तीय व्यवस्थाओं को लेकर किसी प्रकार की अनियमितता के आरोप सामने आते हैं तो यह केवल आर्थिक मामला नहीं रह जाता, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं से जुड़ा विषय बन जाता है।
विशेष जांच टीम (एसआईटी) द्वारा सरकार को 150 पृष्ठों की रिपोर्ट सौंपे जाने और उसमें कथित रूप से एफआईआर दर्ज करने तथा ट्रस्ट के पुनर्गठन जैसी सिफारिशों की चर्चा ने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यदि जांच एजेंसी ने वास्तव में ऐसे गंभीर सुझाव दिए हैं तो यह संकेत है कि मामले को साधारण प्रशासनिक त्रुटि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि मंदिर में आने वाले चढ़ावे और दान की व्यवस्था में कहीं भी पारदर्शिता की कमी रही है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है? आखिर वह कौन लोग हैं जिनकी निगरानी में करोड़ों रुपये का लेन-देन हुआ? क्या सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया? क्या खरीद और भुगतान की व्यवस्था निर्धारित मानकों के अनुरूप थी? इन सवालों के जवाब देश जानना चाहता है।
राम मंदिर किसी व्यक्ति, संगठन या ट्रस्ट की निजी संपत्ति नहीं है। यह उन करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है जिन्होंने वर्षों तक इसके निर्माण का सपना देखा। इसलिए यहां होने वाले प्रत्येक आर्थिक लेन-देन का हिसाब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट और पारदर्शी होना चाहिए। आस्था का सबसे बड़ा आधार विश्वास होता है और विश्वास तभी कायम रहता है जब व्यवस्थाएं संदेह से परे हों।
यह भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में अक्सर बड़े घोटालों और अनियमितताओं की जांच राजनीतिक बहस का विषय बन जाती है। राम मंदिर का मामला राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए। यदि कोई दोषी है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और यदि आरोप निराधार हैं तो जांच के माध्यम से सच्चाई सामने लाकर भ्रम को समाप्त किया जाना चाहिए।
सरकार के सामने भी यह एक बड़ी परीक्षा है। उत्तर प्रदेश सरकार और संबंधित एजेंसियों को निष्पक्षता, पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई का परिचय देना होगा। जांच रिपोर्ट को केवल फाइलों तक सीमित रखने के बजाय उसके आधार पर आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए। यदि किसी स्तर पर लापरवाही, भ्रष्टाचार या विश्वासघात सिद्ध होता है तो दोषियों को कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए, चाहे उनका पद कितना भी बड़ा क्यों न हो।
राम मंदिर राष्ट्र की आस्था का प्रतीक है। यहां एक रुपये के चढ़ावे पर भी उतनी ही ईमानदारी और जवाबदेही होनी चाहिए जितनी किसी बड़े सरकारी कोष में होती है। क्योंकि मंदिर में चढ़ाया गया धन केवल मुद्रा नहीं, बल्कि श्रद्धालुओं का विश्वास होता है। और विश्वास की रक्षा हर कीमत पर होनी चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जांच पूरी पारदर्शिता से हो, सत्य जनता के सामने आए और भविष्य में ऐसी किसी भी आशंका को समाप्त करने के लिए मजबूत व्यवस्था विकसित की जाए। राम के नाम पर जुटाई गई आस्था की पूंजी पर यदि किसी ने हाथ डाला है तो उसे कानून और समाज दोनों के कठोर प्रश्नों का सामना करना होगा।यह संपादकीय समाचार पत्र शैली में प्रकाशित करने योग्य रूप में तैयार किया गया है।


