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Wednesday, June 17, 2026

जब सिस्टम खुद कठघरे में खड़ा हो जाए…

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शरद कटियार
उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में सामने आई चार बड़ी घटनाओं ने शासन, प्रशासन और व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर राम मंदिर के करोड़ों रुपये के चढ़ावे की जांच में एसआईटी दस्तावेज खंगाल रही है, दूसरी ओर बिजली विभाग में रिश्वतखोरी और करोड़ों के कथित गबन के मामले उजागर हो रहे हैं। वहीं सड़क सुरक्षा के नाम पर सैकड़ों ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित किए जा रहे हैं। इन सभी घटनाओं को अलग-अलग मामलों के रूप में देखने की बजाय यदि एक साथ रखा जाए तो एक चिंताजनक तस्वीर सामने आती है,व्यवस्था में जवाबदेही का संकट।

अयोध्या का राम मंदिर करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। यहां चढ़ाया गया एक-एक रुपया श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का प्रतीक है। ऐसे में चढ़ावे की राशि को लेकर उठे सवाल केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह जनता के विश्वास से जुड़ा मामला है। एसआईटी द्वारा ट्रस्ट पदाधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित लोगों से पूछताछ यह संकेत देती है कि जांच एजेंसियां मामले को गंभीरता से ले रही हैं। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी थी तो जांच की नौबत क्यों आई? और यदि कहीं गड़बड़ी हुई है तो उसकी जिम्मेदारी केवल कर्मचारियों तक सीमित होगी या जवाबदेही ऊपर तक तय होगी?

दूसरी ओर बिजली विभाग की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है। राजधानी लखनऊ में नए कनेक्शन के एस्टीमेट के नाम पर पांच लाख रुपये रिश्वत मांगने के आरोप में जेई का निलंबन और कर्मचारियों की बर्खास्तगी यह साबित करती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें अभी भी गहरी हैं। आम नागरिक वर्षों से बिजली विभाग में फाइल, कनेक्शन, बिल संशोधन और लाइन विस्तार के नाम पर होने वाली अनौपचारिक वसूली की शिकायत करता रहा है। सवाल यह है कि यदि शिकायत न होती तो क्या यह मामला भी दबा रहता?

इससे भी बड़ा मामला वाराणसी में सामने आया, जहां सात करोड़ रुपये के कथित गबन के आरोप में लेखाकार को बर्खास्त किया गया। सात करोड़ रुपये कोई छोटी रकम नहीं होती। यह रकम बताती है कि निगरानी तंत्र की विफलता कितनी बड़ी रही होगी। किसी भी सरकारी विभाग में करोड़ों रुपये का खेल महीनों या वर्षों तक बिना किसी आंतरिक जांच के चलता रहे, यह अपने आप में गंभीर चिंता का विषय है।

इसी बीच परिवहन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि केवल तीन महीनों में 797 ड्राइविंग लाइसेंस निलंबित और 20 निरस्त किए गए। यह कार्रवाई स्वागत योग्य है, लेकिन यह भी संकेत है कि सड़कों पर नियमों की अनदेखी किस स्तर तक पहुंच चुकी है। दुर्घटनाओं के बाद कार्रवाई करना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक दुर्घटनाओं को रोकना है। यदि लाइसेंस जारी करने, वाहन फिटनेस और यातायात प्रवर्तन की व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी होती तो शायद इतने बड़े पैमाने पर दंडात्मक कार्रवाई की जरूरत ही न पड़ती।

इन सभी मामलों का एक साझा सूत्र है—जवाबदेही। चाहे मंदिर ट्रस्ट हो, बिजली विभाग हो या परिवहन व्यवस्था, समस्या वहीं पैदा होती है जहां निगरानी कमजोर पड़ती है और जवाबदेही समाप्त होने लगती है। भ्रष्टाचार, अनियमितता और लापरवाही किसी एक विभाग की समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति की चुनौती है।

प्रदेश सरकार लगातार “जीरो टॉलरेंस” की बात करती है। हालिया कार्रवाइयां यह भी दिखाती हैं कि कई मामलों में कार्रवाई हो रही है। लेकिन केवल कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि ऐसी व्यवस्थाएं विकसित हों जहां गड़बड़ी होने से पहले ही पकड़ी जा सके। डिजिटल निगरानी, नियमित ऑडिट, स्वतंत्र जांच और पारदर्शी सूचना प्रणाली आज की सबसे बड़ी जरूरत हैं।

जनता का विश्वास किसी भी सरकार और संस्था की सबसे बड़ी पूंजी होता है। राम मंदिर की आस्था हो, बिजली विभाग की सेवा हो या सड़क सुरक्षा का भरोसा—यदि इन पर सवाल खड़े होते हैं तो नुकसान केवल संस्थाओं का नहीं, पूरे तंत्र की विश्वसनीयता का होता है।

आज जरूरत केवल दोषियों को दंडित करने की नहीं, बल्कि व्यवस्था को इस तरह बदलने की है कि भविष्य में ऐसे सवाल खड़े ही न हों। क्योंकि जब सिस्टम खुद कठघरे में खड़ा दिखाई देने लगे, तब सुधार विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन जाता है।

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