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Monday, May 4, 2026

यूपी की अर्थव्यवस्था पर ‘बड़ा दावा’, क्या सच में ‘बीमारू’ से ‘रेवेन्यू सरप्लस’ तक का सफर पूरा हो गया?

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शरद कटियार
सत्ता के मंच से जब आंकड़े और दावे गूंजते हैं, तो वे सिर्फ राजनीतिक संदेश नहीं होते—वे राज्य की आर्थिक सच्चाई का आईना भी बनते हैं। सहकारी समितियां एवं पंचायत लेखा परीक्षा विभाग के नव चयनित लेखा परीक्षकों को नियुक्ति-पत्र वितरण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो तस्वीर पेश की, वह एक ‘परिवर्तित उत्तर प्रदेश’ की कहानी कहती है—लेकिन क्या यह पूरी कहानी है?
मुख्यमंत्री का दावा है कि 2017 से पहले उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य था, जिसे बैंक कर्ज देने से भी कतराते थे। आज वही राज्य ‘रेवेन्यू सरप्लस’ बन चुका है। यह दावा राजनीतिक रूप से जितना आकर्षक है, आर्थिक रूप से उतना ही जटिल भी।
रेवेन्यू सरप्लस बनाम कर्ज का सच
रेवेन्यू सरप्लस का मतलब होता है कि सरकार की आमदनी (राजस्व) उसके नियमित खर्च से ज्यादा है। लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक हिस्सा है। असल सवाल यह है कि राज्य का कुल कर्ज कितना है, और विकास परियोजनाओं के लिए किस स्तर तक उधारी ली जा रही है।
सरकारी बजट दस्तावेजों के अनुसार, उत्तर प्रदेश का कुल कर्ज लगातार बढ़ते ग्राफ पर है और हर साल हजारों करोड़ रुपये की उधारी का प्रावधान रखा जाता है। ऐसे में ‘बिना कर्ज विकास’ का दावा तकनीकी रूप से आधा सच भी हो सकता है और राजनीतिक प्रस्तुति भी।
मुख्यमंत्री ने गंगा एक्सप्रेसवे को मॉडल प्रोजेक्ट के तौर पर पेश किया,करीब 600 किलोमीटर लंबा यह एक्सप्रेसवे, जिस पर 36,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हो रहा है और कुल निवेश 42,000 करोड़ के आसपास बताया गया है। इसके साथ 9 इंडस्ट्रियल और लॉजिस्टिक हब, 7000 एकड़ जमीन पर विकसित किए जा रहे हैं।
यह निश्चित रूप से यूपी के इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़ा बदलाव है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इन प्रोजेक्ट्स से तत्काल रोजगार और आय में उतनी तेजी से वृद्धि होगी, जितनी तेजी से इनके आंकड़े पेश किए जा रहे हैं?
सरकार का दावा है कि कानून व्यवस्था सुधरी है, निवेश बढ़ा है और वित्तीय अनुशासन कायम हुआ है। इसमें आंशिक सच्चाई भी दिखती है एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, डिफेंस कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट्स इसका प्रमाण हैं।
लेकिन दूसरी तरफ बेरोजगारी, कृषि आय, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अभी भी चुनौतियां बनी हुई हैं। युवा वर्ग, जो इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी होना चाहिए, वही सबसे ज्यादा सवाल भी उठा रहा है।
इस कार्यक्रम का सबसे अहम पहलू वह युवा वर्ग है, जिसे लेखा परीक्षक के रूप में सिस्टम का हिस्सा बनाया गया है। यह सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि वित्तीय पारदर्शिता की जिम्मेदारी है।
अगर सरकार वास्तव में ‘वित्तीय अनुशासन’ की बात कर रही है, तो इन युवाओं की भूमिका बेहद अहम होगी क्योंकि वही तय करेंगे कि आंकड़े सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या जमीन पर भी उतर रहे हैं।
निष्कर्ष: दावा बड़ा है, पर परीक्षा बाकी है
उत्तर प्रदेश ने निश्चित रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक स्तर पर बदलाव की दिशा पकड़ी है। लेकिन ‘बीमारू से रेवेन्यू सरप्लस’ तक का सफर केवल दावों से पूरा नहीं होता इसके लिए जमीनी आंकड़ों, पारदर्शिता और जनता के जीवन स्तर में वास्तविक सुधार जरूरी है।
आज का सवाल यही है क्या यूपी वाकई आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह पर स्थायी रूप से आगे बढ़ चुका है, या यह अभी भी एक अधूरी कहानी है, जिसे पूरा होने में वक्त लगेगा?

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