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Thursday, April 16, 2026

विकसित भारत का सपना—तकनीक नहीं, सोच बदलने की असली चुनौती

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भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का जो संकल्प लिया है, वह जितना आकर्षक दिखता है, उतना ही कठिन और चुनौतीपूर्ण भी है। आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा केवल योजनाओं और भाषणों से पूरी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए देश को अपनी कार्यशैली, शिक्षा व्यवस्था और सोच—तीनों में व्यापक बदलाव लाना होगा।
गोरखपुर में आयोजित कार्यक्रम में टाटा संस के अध्यक्ष एन . चन्द्रसेकरण की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि अब देश में उद्योग और शिक्षा के बीच तालमेल बनाने की कोशिश हो रही है। यह एक सकारात्मक पहल है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह प्रयास जमीन तक पहुंचेगा या केवल मंचों तक सीमित रह जाएगा।
आज सबसे अधिक चर्चा नई तकनीकों की हो रही है। यह सही भी है, क्योंकि बिना तकनीक के कोई भी देश विकास की दौड़ में आगे नहीं बढ़ सकता। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि तकनीक केवल साधन है, लक्ष्य नहीं। जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति तक इसका लाभ नहीं पहुंचेगा, तब तक विकास अधूरा ही रहेगा।
सबसे बड़ी चुनौती गांव और शहर के बीच की खाई है। शहरों में जहां नई सुविधाएं तेजी से पहुंच रही हैं, वहीं ग्रामीण भारत आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। किसान, जिसे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, आज भी मौसम, बाजार और संसाधनों की अनिश्चितता से जूझ रहा है। यदि उसे सही जानकारी और साधन मिलें, तो वही किसान देश को नई ऊंचाइयों तक ले जा सकता है।
कार्यक्रम में किसानों और छात्रों को सम्मानित करना निश्चित रूप से सराहनीय कदम है, लेकिन इससे आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना होगा कि उन्हें निरंतर अवसर और संसाधन भी मिलें। केवल सम्मान से विकास नहीं होता, उसके लिए निरंतर सहयोग और नीति की स्पष्टता आवश्यक है।
शिक्षा की बात करें तो आज भी हमारे अधिकांश संस्थान केवल डिग्री देने तक सीमित हैं। छात्रों को नौकरी के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन उन्हें नया सोचने, नया करने और जोखिम उठाने की प्रेरणा बहुत कम मिलती है। जब तक शिक्षा व्यवस्था में सुधार नहीं होगा, तब तक नवाचार केवल कुछ बड़े शहरों और चुनिंदा संस्थानों तक ही सीमित रहेगा।
विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब सरकार, उद्योग और समाज मिलकर काम करेंगे। सरकार नीतियां बनाए, उद्योग अवसर प्रदान करे और समाज उन अवसरों का सही उपयोग करे—यह संतुलन जरूरी है।
अंततः यह समझना होगा कि विकसित भारत केवल आर्थिक प्रगति का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे समाज का निर्माण है जहां हर व्यक्ति को समान अवसर मिले, हर क्षेत्र में संतुलित विकास हो और हर नागरिक अपने देश की प्रगति में भागीदार बने।
संकल्प लेना आसान है, लेकिन उसे जमीन पर उतारना कठिन। यदि भारत को सच में विकसित राष्ट्र बनना है, तो उसे तकनीक के साथ-साथ अपनी सोच, व्यवस्था और प्राथमिकताओं में भी बड़ा बदलाव लाना होगा। यही इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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