एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की परतें खुली हैं और तस्वीर उतनी ही चिंताजनक है जितनी पहले थी। कथित किडनी कांड के बाद जिस तरह स्वास्थ्य विभाग ने अचानक सक्रियता दिखाई और रामादेवी क्षेत्र में अस्पतालों पर छापेमारी की, वह कार्रवाई जितनी जरूरी थी, उतनी ही देर से भी प्रतीत होती है। सवाल यह नहीं कि कार्रवाई हुई, बल्कि यह है कि ऐसी स्थिति बनने तक व्यवस्था सोई क्यों रही।
चीफ मेडिकल ऑफिसर ऑफिस कानपुर की अगुवाई में आठ अस्पतालों की जांच में जो खामियां सामने आईं, वह केवल कुछ संस्थानों की लापरवाही नहीं बल्कि पूरे तंत्र की विफलता की कहानी कहती हैं। खास तौर पर सहाय हॉस्पिटल में ऑपरेशन थिएटर और आईसीयू को सील किया जाना यह बताता है कि मरीजों की जान से किस स्तर पर खिलवाड़ हो रहा था।
यह पहली बार नहीं है जब निजी अस्पतालों में मानकों की अनदेखी सामने आई हो। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी कार्रवाई “घटना के बाद” ही होती दिखाई दे रही है। यदि नियमित निरीक्षण और पारदर्शी निगरानी व्यवस्था पहले से प्रभावी होती, तो शायद ऐसे कांड सामने ही नहीं आते।
सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। क्या केवल अस्पतालों को नोटिस देकर या सील कर देने से समस्या का समाधान हो जाएगा? या फिर यह भी जरूरी है कि उन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए जिनके क्षेत्र में ये अस्पताल बिना मानकों के चलते रहे? स्वास्थ्य सेवा जैसा संवेदनशील क्षेत्र केवल कागजी नियमों से नहीं, बल्कि जमीनी सख्ती और ईमानदार निगरानी से चलता है।
छह अन्य अस्पतालों को नोटिस जारी करना एक औपचारिक प्रक्रिया जरूर है, लेकिन इससे ज्यादा जरूरी यह है कि जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो, ताकि आम जनता को यह पता चल सके कि जिन संस्थानों में वे इलाज करा रहे हैं, वे कितने सुरक्षित हैं। पारदर्शिता ही भरोसे की पहली शर्त है।
किडनी कांड जैसे मामले केवल अपराध नहीं होते, बल्कि यह समाज और व्यवस्था के बीच टूटते विश्वास का संकेत भी होते हैं। जब इलाज के नाम पर जीवन से खिलवाड़ होने लगे, तो यह केवल कानून का नहीं, नैतिकता का भी संकट बन जाता है।
अब जरूरत केवल छापेमारी की नहीं, बल्कि स्थायी सुधार की है। एक ऐसी व्यवस्था की जरूरत है जहां अस्पतालों का पंजीकरण, निरीक्षण और संचालन पूरी तरह डिजिटल निगरानी में हो, जहां हर ऑपरेशन, हर सुविधा और हर डॉक्टर की योग्यता का रिकॉर्ड सार्वजनिक और सत्यापित हो।
प्रशासन ने लोगों से संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देने की अपील जरूर की है, लेकिन सवाल यह है कि क्या आम नागरिक ही निगरानी का माध्यम बनेंगे? या फिर विभाग खुद अपनी जिम्मेदारी को मजबूत करेगा?
कानपुर की यह घटना एक चेतावनी है—यदि अब भी स्वास्थ्य तंत्र में व्यापक सुधार नहीं किए गए, तो ऐसे कांड बार-बार सामने आते रहेंगे और हर बार कीमत चुकानी पड़ेगी आम जनता को।
कानपुर का किडनी कांड: स्वास्थ्य व्यवस्था पर गहरा सवाल, छापेमारी नहीं—व्यवस्था सुधार की असली जरूरत


