शरद कटियार
अयोध्या का राम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं है। यह करोड़ों हिंदुओं की आस्था, दशकों के संघर्ष, न्यायिक प्रक्रिया और राष्ट्रीय भावनाओं का प्रतीक है। ऐसे में जब मंदिर के चढ़ावे और दान राशि को लेकर कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आते हैं, तो यह महज वित्तीय विवाद नहीं रह जाता बल्कि जनविश्वास से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न बन जाता है।
हाल के दिनों में राम मंदिर के दानपात्र और चढ़ावे के प्रबंधन को लेकर उठे विवाद ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। पूर्व लेखाकार द्वारा लगाए गए आरोपों, संतों की प्रतिक्रियाओं और राजनीतिक दलों की बयानबाजी ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। अब लखनऊ में हुई बैठक के बाद किसी रिटायर्ड जज से जांच कराने का निर्णय इस बात का संकेत है कि मामला साधारण नहीं माना जा रहा।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि आरोप इतने गंभीर हैं कि न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति से जांच कराने की जरूरत महसूस की गई, तो फिर अब तक एफआईआर दर्ज क्यों नहीं हुई? यदि आरोप निराधार हैं तो उन्हें तत्काल खारिज कर पारदर्शी दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। और यदि आरोपों में प्रथम दृष्टया दम है तो फिर कानूनी कार्रवाई में देरी क्यों? यही वह सवाल है जो आज आम श्रद्धालु के मन में उठ रहा है।
राम मंदिर का निर्माण देशभर के करोड़ों लोगों के योगदान, भावनाओं और विश्वास से हुआ है। हजारों लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान दिया। किसी ने गहने दिए, किसी ने जीवन भर की बचत। ऐसे में दान राशि के एक-एक रुपये का हिसाब सार्वजनिक जवाबदेही का विषय बन जाता है। यह केवल ट्रस्ट का नहीं, बल्कि उन करोड़ों श्रद्धालुओं का अधिकार है जिन्होंने मंदिर निर्माण को अपना व्यक्तिगत दायित्व समझा।
विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। केवल आरोप लग जाना किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी नहीं बना देता। भारतीय न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत है कि जांच से पहले किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता। इसलिए आवश्यक है कि जांच निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध हो। जांच का उद्देश्य किसी को बचाना या फंसाना नहीं, बल्कि सत्य को सामने लाना होना चाहिए।
दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि धार्मिक संस्थानों से जुड़े विवाद अक्सर राजनीतिक रंग ले लेते हैं। एक पक्ष इसे भ्रष्टाचार का मुद्दा बताता है तो दूसरा इसे आस्था पर हमला करार देता है। जबकि वास्तविकता यह है कि पारदर्शिता और आस्था एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि जितनी अधिक पारदर्शिता होगी, श्रद्धालुओं का विश्वास उतना ही मजबूत होगा।
देश के बड़े धार्मिक संस्थानों के लिए यह विवाद एक सबक भी है। आधुनिक दौर में केवल धार्मिक प्रतिष्ठा पर्याप्त नहीं है। वित्तीय प्रबंधन, ऑडिट, डिजिटल रिकॉर्ड और सार्वजनिक जवाबदेही भी उतनी ही आवश्यक हैं। जिस प्रकार कंपनियां और सरकारी संस्थान अपने वित्तीय लेन-देन का लेखा-जोखा प्रस्तुत करते हैं, उसी प्रकार विशाल जनधन और चढ़ावे का संचालन करने वाले धार्मिक संस्थानों को भी अधिक पारदर्शी व्यवस्था अपनानी चाहिए।
राम मंदिर का महत्व किसी राजनीतिक दल, सरकार या ट्रस्ट से कहीं बड़ा है। यह करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए इस विवाद का समाधान भी उसी स्तर की गंभीरता और निष्पक्षता से होना चाहिए। जांच केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, बल्कि उसके निष्कर्ष सार्वजनिक हों और यदि कहीं कोई गड़बड़ी पाई जाए तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई भी सुनिश्चित हो।
आस्था की सबसे बड़ी ताकत विश्वास है। और विश्वास तभी मजबूत रहता है जब उसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही जुड़ी हो। राम मंदिर विवाद में असली चुनौती आरोपों या प्रत्यारोपों की नहीं, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास को अक्षुण्ण बनाए रखने की है। इसलिए यह समय भावनाओं से अधिक तथ्यों और राजनीति से अधिक पारदर्शिता का है।
राम मंदिर राष्ट्र की आस्था का प्रतीक है। ऐसे में हर सवाल का जवाब भी उसी गरिमा, ईमानदारी और पारदर्शिता के साथ दिया जाना चाहिए, जिसकी अपेक्षा करोड़ों रामभक्त करते हैं।


