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Monday, July 27, 2026

संसद का गतिरोध, समाधान के बाद भी टकराव

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शरद कटियार

देश की संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की वह सर्वोच्च पंचायत है जहां जनता की आवाज़ गूंजती है। सरकार और विपक्ष, दोनों की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे जनता से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करें, सरकार से जवाब मांगें और समाधान तलाशें। लेकिन जब संसद का अधिकांश समय हंगामे और स्थगन की भेंट चढ़ जाता है, तब सबसे बड़ा नुकसान लोकतांत्रिक व्यवस्था और देश की जनता का होता है।

हाल के दिनों में पेपर लीक का मुद्दा देशभर में लाखों युवाओं की चिंता का कारण बना। परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठे, छात्र सड़कों पर उतरे और सरकार पर जवाबदेही का दबाव बढ़ा। इसके बाद केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की घोषणा की। शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में बदलाव किए गए, परीक्षा प्रणाली को मजबूत करने के लिए संस्थागत सुधारों की बात हुई, फास्ट-ट्रैक अदालतों के माध्यम से ऐसे मामलों के शीघ्र निस्तारण का प्रस्ताव रखा गया और पेपर लीक के खिलाफ सख्त कानूनी ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई गई।

यही वह बिंदु है जहां राजनीति और लोकतंत्र के बीच अंतर स्पष्ट होता है। यदि किसी मुद्दे पर सरकार कार्रवाई करती है, तो उसके बाद संसद का अगला दायित्व उन कदमों की समीक्षा करना, उनकी कमियों पर चर्चा करना और आवश्यक सुधार सुझाना होता है। लोकतंत्र में बहस का विकल्प हंगामा नहीं हो सकता।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी इसी संदर्भ में कहा कि संसद का उद्देश्य टकराव नहीं बल्कि विचार-विमर्श है। उनका यह संदेश केवल विपक्ष के लिए नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए है कि संसद की कार्यवाही बाधित होने से देश के महत्वपूर्ण विधेयक, आर्थिक फैसले और जनहित से जुड़े विषय प्रभावित होते हैं।

हालांकि, लोकतंत्र का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विपक्ष का मूल दायित्व सरकार से जवाब मांगना, उसकी नीतियों की समीक्षा करना और कमियों को उजागर करना है। यदि विपक्ष को लगता है कि सरकार के कदम पर्याप्त नहीं हैं या किसी मामले में निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है, तो उसे अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। लेकिन यह अधिकार संसद की कार्यवाही को अनिश्चितकाल तक बाधित करने का औचित्य स्वतः सिद्ध नहीं करता। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति संवाद है, बहिष्कार नहीं।

हर दिन संसद की कार्यवाही पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन खर्च होता है। जब सदन बिना कामकाज के स्थगित होता है तो उसका आर्थिक बोझ अंततः देश के करदाताओं पर पड़ता है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि अनेक महत्वपूर्ण विधेयक, नीतिगत निर्णय और जनता से जुड़े प्रश्न अधर में लटक जाते हैं।

आज देश का युवा राजनीति से अधिक परिणाम चाहता है। उसे सुरक्षित परीक्षाएं, पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया, समय पर रोजगार और जवाबदेह व्यवस्था चाहिए। यदि सरकार सुधार लागू करती है तो उनकी प्रभावशीलता पर संसद में गंभीर चर्चा होनी चाहिए। यदि सुधार अधूरे हैं तो विपक्ष को तथ्यों और तर्कों के साथ उन्हें चुनौती देनी चाहिए। यही स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान है।

संसद में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका प्रतिस्पर्धी अवश्य है, लेकिन विरोधी नहीं। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सरकार जवाबदेह हो और विपक्ष जिम्मेदार। संसद का समय नारेबाजी में नहीं, नीति निर्माण में लगना चाहिए। देश की जनता ने अपने प्रतिनिधियों को बहस करने, समाधान खोजने और भविष्य की दिशा तय करने के लिए चुना है, न कि गतिरोध पैदा करने के लिए।

निष्कर्षत, संसद लोकतंत्र का मंदिर तभी बन सकती है जब उसमें संवाद, शालीनता और जवाबदेही तीनों साथ चलें। राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र की शक्ति हैं, लेकिन यदि वे जनहित से ऊपर चले जाएं तो सबसे बड़ा नुकसान देश और उसके नागरिकों का होता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर संसद को जनहित के वास्तविक मंच के रूप में स्थापित करें।

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