
प्रो. एच. एन. शर्मा
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। संविधान ने हर नागरिक को समान अधिकार दिए हैं, लेकिन सामाजिक व्यवहार की जमीन पर आज भी एक कड़वी सच्चाई मौजूद है—व्यक्ति का मूल्यांकन उसके विचारों, चरित्र, कर्म और उपलब्धियों से कम, उसकी जाति से अधिक किया जाने लगा है। यह केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना पर लगा ऐसा दाग है जो विकास, समानता और सामाजिक सौहार्द के रास्ते में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बन चुका है।
आज स्थिति यह है कि किसी व्यक्ति की योग्यता जानने से पहले उसकी जाति पूछी जाती है। किसी की सफलता को मेहनत का परिणाम मानने के बजाय उसे जातीय चश्मे से देखा जाता है। राजनीति, नौकरशाही, शिक्षा, व्यापार और यहां तक कि सामाजिक संबंधों में भी जातीय पहचान का प्रभाव लगातार बढ़ता दिखाई देता है। यह प्रवृत्ति केवल पिछड़ेपन का प्रतीक नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास के संकट की भी निशानी है।
विडंबना यह है कि विज्ञान, तकनीक और अंतरिक्ष की नई ऊंचाइयों को छू रहे देश में मानसिकता का एक बड़ा हिस्सा अभी भी जातीय खांचों में कैद है। सोशल मीडिया ने इस बीमारी को और अधिक उजागर कर दिया है। किसी अधिकारी, खिलाड़ी, कलाकार या नेता की उपलब्धि सामने आते ही उसके काम की चर्चा कम और उसकी जाति की चर्चा अधिक होने लगती है। मानो उसकी पहचान उसके व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि जातीय उपनाम से तय होती हो।
राजनीति ने भी इस मानसिकता को कमजोर करने के बजाय कई बार उसे मजबूती दी है। चुनावी गणित ने जातियों को वोट बैंक में बदल दिया। राजनीतिक दलों ने सामाजिक न्याय के नाम पर कई सकारात्मक कार्य किए, लेकिन साथ ही जातीय ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा मिला। परिणाम यह हुआ कि नागरिक पहले मतदाता बना, फिर मतदाता से जातीय मतदाता और अंततः जातीय समूह का हिस्सा बनकर रह गया।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि नई पीढ़ी भी इस प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पा रही। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवा भी कई बार मित्रता, विवाह, सामाजिक संबंध और राजनीतिक पसंद का आधार जाति को बना लेते हैं। इससे सामाजिक एकता की वह भावना कमजोर होती है, जो किसी भी मजबूत राष्ट्र की नींव होती है।
भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि महानता कभी जाति की मोहताज नहीं रही। कबीर, रैदास, बाबा साहेब आंबेडकर, महात्मा गांधी, सरदार पटेल, एपीजे अब्दुल कलाम और अनगिनत महापुरुषों ने अपने कर्मों से पहचान बनाई। इतिहास ने उन्हें उनकी जाति से नहीं, उनके योगदान से याद रखा। यही कारण है कि समय के साथ व्यक्ति का कर्म अमर होता है, जाति नहीं।
समाज को यह समझना होगा कि जाति जन्म से मिल सकती है, लेकिन सम्मान कर्मों से अर्जित होता है। किसी डॉक्टर, शिक्षक, सैनिक, किसान, वैज्ञानिक या पत्रकार का मूल्यांकन उसकी जाति से नहीं, उसके कार्य और चरित्र से होना चाहिए। यदि समाज व्यक्ति की योग्यता को जातीय चश्मे से देखता रहेगा तो प्रतिभाएं हतोत्साहित होंगी और सामाजिक विभाजन गहराता जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को जातीय श्रेष्ठता या हीनता नहीं, बल्कि मानवीय समानता का पाठ पढ़ाएं। संविधान की भावना भी यही है कि हर नागरिक पहले भारतीय है, उसके बाद कुछ और। जब तक समाज व्यक्ति को उसकी जाति से ऊपर उठकर नहीं देखेगा, तब तक सच्चे अर्थों में सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता का सपना अधूरा रहेगा।
देश को आगे बढ़ाना है तो जाति नहीं, क्षमता को महत्व देना होगा; उपनाम नहीं, योगदान को पहचानना होगा; और जन्म नहीं, कर्म को सम्मान देना होगा। यही एक आधुनिक, समरस और मजबूत भारत की पहचान हो सकती है।
लेखक पूर्व पीएम चंद्रशेखर के राजनैतिक सलाहकार रहे हैं।


