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Tuesday, April 21, 2026
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क्या इंटरव्यू बोर्ड में सामाजिक संतुलन के बिना संभव है निष्पक्ष चयन?

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देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है। सवाल केवल चयन का नहीं, बल्कि उस चयन की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और सामाजिक संतुलन का है। हालिया परिणामों ने यह साफ संकेत दिया है कि लिखित परीक्षा से ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाने वाला इंटरव्यू चरण अब सबसे अधिक विवादित होता जा रहा है।
सिस्टम की बुनियाद ही तब हिलने लगती है, जब मेहनत से लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थी अंतिम सूची से बाहर हो जाते हैं, जबकि औसत प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवार इंटरव्यू के ऊंचे अंकों के सहारे शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। 1750 अंकों की मुख्य परीक्षा और 275 अंकों के साक्षात्कार का यह समीकरण अब असंतुलित नजर आने लगा है, जहां इंटरव्यू एक निर्णायक हथियार बन चुका है,और यही सबसे बड़ा सवाल भी।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इंटरव्यू लेने वाली समितियों की संरचना पर अब तक गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यदि चयन का अंतिम फैसला एक सीमित समूह करता है, जिसमें सामाजिक, क्षेत्रीय और भाषाई विविधता का अभाव हो, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह केवल एक तकनीकी कमी नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रणाली के मूल उद्देश्य पर सीधा प्रहार है।
भाषा का मुद्दा इस विवाद को और गहरा करता है। भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों के साथ मूल्यांकन में भेदभाव के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के उम्मीदवारों को इंटरव्यू में सहजता और बेहतर अभिव्यक्ति का लाभ मिलता है, जबकि ग्रामीण या हिंदी माध्यम के प्रतिभाशाली अभ्यर्थी उसी मंच पर पिछड़ जाते हैं। यह स्थिति समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।
इस पूरी प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव। जब इंटरव्यू बोर्ड में अलग-अलग वर्गों, समुदायों, क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के लोग शामिल नहीं होते, तो मूल्यांकन का नजरिया सीमित हो जाता है। ऐसे में कई बार प्रतिभा को उसके वास्तविक संदर्भ में समझा ही नहीं जाता।
यही कारण है कि अब मांग उठ रही है कि इंटरव्यू बोर्ड का पुनर्गठन किया जाए। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, महिलाओं और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को समान रूप से शामिल किया जाए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि अभ्यर्थियों को यह भरोसा भी मिलेगा कि उनका मूल्यांकन निष्पक्ष तरीके से हो रहा है।
इतिहास गवाह है कि सिविल सेवा परीक्षा की संरचना में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। कोठारी समिति की सिफारिशों पर आधारित वर्तमान ढांचा अब बदलते भारत की जरूरतों के अनुरूप पूरी तरह फिट नहीं बैठता। आज देश का सामाजिक और शैक्षणिक परिदृश्य बदल चुका है—ऐसे में चयन प्रक्रिया का भी आधुनिक और समावेशी होना जरूरी है।
ग्रामीण भारत के युवाओं की स्थिति इस पूरे मुद्दे का सबसे संवेदनशील पक्ष है। महानगरों में कोचिंग, संसाधन और मार्गदर्शन की उपलब्धता के कारण वहां के अभ्यर्थियों को स्वाभाविक बढ़त मिलती है। दूसरी ओर छोटे शहरों और गांवों के छात्र सीमित संसाधनों के बावजूद कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन इंटरव्यू जैसे चरण में वे अक्सर सिस्टम की खामियों का शिकार हो जाते हैं।
यह केवल परीक्षा की समस्या नहीं है यह प्रशासनिक ढांचे के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यदि चयन प्रक्रिया में संतुलन और समान अवसर नहीं होगा, तो देश को विविध समाज का सही प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारी कैसे मिलेंगे?
अब समय आ गया है कि सरकार और आयोग इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें। इंटरव्यू बोर्ड में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना केवल सुधार नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली, भाषा के आधार पर भेदभाव का अंत और सभी वर्गों की भागीदारी—यही वे कदम हैं, जो इस व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं।
यदि देश को निष्पक्ष, संवेदनशील और जमीनी समझ रखने वाले प्रशासनिक अधिकारी चाहिए, तो चयन प्रक्रिया को भी उतना ही न्यायपूर्ण बनाना होगा। इंटरव्यू बोर्ड में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

भारत की आत्मा है ब्राह्मण,: परंपरा ज्ञान, त्याग और राष्ट्रनिर्माण की अदृश्य शक्ति का श्रोत भी

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— शरद कटियार
भारतीय सभ्यता की जड़ों में यदि गहराई से उतरकर देखा जाए, तो एक ऐसी परंपरा दिखाई देती है जिसने न केवल ज्ञान की धारा को जीवित रखा, बल्कि राष्ट्र की आत्मा उसकी अस्मिता—को भी संजोकर रखा। यह परंपरा है ब्राह्मण समाज की, जिसने सदियों तक भारत को विचार, संस्कृति और नैतिक दिशा प्रदान की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जब-जब भारत की पहचान पर संकट आया, तब-तब इस परंपरा ने अपने ज्ञान, तप और त्याग से उसे संभालने का काम किया।
ब्राह्मण समाज का योगदान केवल धार्मिक या शास्त्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहा। यह समाज भारतीय अस्मिता का संरक्षक बनकर उभरा—चाहे वह भाषा हो, संस्कृति हो, या राष्ट्र की एकता का प्रश्न। प्राचीन काल में जब बाहरी आक्रमणों का दौर था, तब भी ब्राह्मणों ने अपने ज्ञान और परंपराओं को बचाकर रखा। उन्होंने वेद, उपनिषद और शास्त्रों को पीढ़ी दर पीढ़ी सुरक्षित पहुंचाया, जिससे भारत की सांस्कृतिक पहचान कभी खत्म नहीं हुई।
इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि ब्राह्मण समाज ने केवल शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि समाज को जोड़ने का कार्य भी किया। विभिन्न जातियों, क्षेत्रों और समुदायों के बीच संवाद और संतुलन बनाए रखने में इस समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। धार्मिक अनुष्ठानों से लेकर सामाजिक व्यवस्थाओं तक, ब्राह्मणों ने एक सूत्र में बांधने का काम किया—जहां समाज का हर वर्ग किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ था।
आजादी की लड़ाई में ब्राह्मण समाज की निर्णायक भूमिका
जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब ब्राह्मण समाज ने केवल शास्त्र नहीं, बल्कि शस्त्र और संघर्ष का भी रास्ता चुना। बाल गंगाधर तिलक ने “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” का नारा देकर पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा की। मदन मोहन मालवीय ने शिक्षा के माध्यम से राष्ट्रवाद को मजबूत किया और काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना कर युवाओं को नई दिशा दी। चंद्रशेखर आज़ाद ने अपने प्राणों की आहुति देकर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।
ये केवल कुछ नाम हैं—ऐसे असंख्य ब्राह्मण स्वतंत्रता सेनानी रहे जिन्होंने जेल की यातनाएं झेली, फांसी के फंदे को चूमा और अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। यह स्पष्ट करता है कि ब्राह्मण समाज ने केवल विचार नहीं दिए, बल्कि राष्ट्र के लिए बलिदान भी दिया।
ज्ञान और राष्ट्रनिर्माण का अटूट संबंध
ब्राह्मण परंपरा ने हमेशा यह संदेश दिया कि ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है। यही कारण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में भी इस समाज ने लेखनी और वाणी के माध्यम से जनजागरण किया। अखबारों, सभाओं और आंदोलनों के जरिए जनता को जागरूक किया गया। शिक्षा को हथियार बनाकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ वैचारिक लड़ाई लड़ी गई।
आजादी के बाद भी ब्राह्मण समाज ने प्रशासन, शिक्षा, न्याय और नीति निर्माण में अपनी भूमिका निभाई। देश के विकास में उनका योगदान विभिन्न क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
आज जब समाज आधुनिकता की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तब भी ब्राह्मण परंपरा के मूल तत्व ज्ञान, संयम, नैतिकता और समाज के प्रति जिम्मेदारी—पहले से अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि केवल भौतिक प्रगति ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि बौद्धिक और नैतिक विकास भी उतना ही जरूरी है।
यूथ इंडिया के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश है कि ब्राह्मण समाज का असली गौरव उसके मूल्यों में है ज्ञान की साधना, समाज को जोड़ने की क्षमता और राष्ट्र के प्रति समर्पण।
आज के युवा, चाहे किसी भी वर्ग या पृष्ठभूमि से हों, यदि इन मूल्यों को अपनाते हैं, तो वे न केवल अपने जीवन को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि देश की प्रगति में भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
ब्राह्मण परंपरा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि भारत की जीवंत पहचान है। यह वह धरोहर है जिसने देश को विचार दिया, दिशा दी और संकट के समय संभाला। आज जरूरत है इस परंपरा के मूल सार को समझने और उसे आगे बढ़ाने की,ताकि भारत की अस्मिता और अधिक मजबूत हो सके।

स्त्री के मन का मंथन

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एक लाचार स्त्री करती क्या?
क्यूंकि एक स्त्री ने स्त्री को ही न समझा

वह बैठी थी खोई हुई,
अपने ही सवालों में उलझी हुई
कि क्या मैं ही देवी हूं?

अपने सवालों में उलझी हुई,
समझ न पायी स्वयं को

उलझते-उलझते उलझ गई,
एक नए जीवन के डोर में

अब न तो इच्छा न तो आशा,
बन गई स्वयं में एक कुहासा

शायद हर गई इस काया से,
पर जीत गई जीवन की माया से

समय से पहले बूढ़ा बना देगी स्किन: कारण, संकेत और बचाव

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डॉ विजय गर्ग
आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में हर कोई चाहता है कि उसकी त्वचा लंबे समय तक जवान और चमकदार बनी रहे। लेकिन बदलती आदतें, बढ़ता प्रदूषण और गलत खान-पान हमारी स्किन को समय से पहले बूढ़ा बना देते हैं। यह समस्या सिर्फ उम्र से जुड़ी नहीं है, बल्कि हमारी दिनचर्या और देखभाल से भी गहराई से जुड़ी है।

समय से पहले स्किन बूढ़ी होने के कारण

सबसे बड़ा कारण है अत्यधिक धूप में रहना। सूरज की हानिकारक यूवी किरणें त्वचा की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे झुर्रियां और दाग-धब्बे जल्दी दिखाई देने लगते हैं।

इसके अलावा प्रदूषण भी त्वचा की चमक छीन लेता है। धूल और धुएं के कण स्किन के पोर्स को बंद कर देते हैं, जिससे त्वचा बेजान लगने लगती है।

गलत खान-पान भी एक बड़ा कारण है। ज्यादा जंक फूड, चीनी और तैलीय भोजन त्वचा की सेहत को नुकसान पहुंचाते हैं।

नींद की कमी और तनाव भी त्वचा पर सीधा असर डालते हैं। पर्याप्त नींद न लेने से डार्क सर्कल्स और झुर्रियां जल्दी आने लगती हैं।

समय से पहले बूढ़ी होती स्किन के संकेत

चेहरे पर जल्दी झुर्रियां दिखना

त्वचा का ढीलापन

डार्क सर्कल्स और फाइन लाइन्स

त्वचा का रूखा और बेजान होना

पिग्मेंटेशन और दाग-धब्बे

अगर ये संकेत कम उम्र में दिखने लगें, तो समझ लेना चाहिए कि त्वचा को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत है।

बचाव के आसान उपाय

सबसे पहले, सनस्क्रीन का नियमित उपयोग करें। घर से बाहर निकलते समय SPF 30 या उससे अधिक का सनस्क्रीन लगाना जरूरी है।

संतुलित आहार अपनाएं। हरी सब्जियां, फल, नट्स और पर्याप्त पानी त्वचा को अंदर से पोषण देते हैं।

पर्याप्त नींद लें। रोजाना 7–8 घंटे की नींद त्वचा को रिपेयर करने में मदद करती है।

स्किन की नियमित सफाई और मॉइश्चराइजिंग करें। इससे त्वचा हाइड्रेटेड और हेल्दी बनी रहती है।

तनाव को नियंत्रित करें। योग और ध्यान जैसी गतिविधियां न केवल मानसिक शांति देती हैं, बल्कि त्वचा पर भी सकारात्मक प्रभाव डालती हैं।

निष्कर्ष

त्वचा का समय से पहले बूढ़ा होना एक चेतावनी है कि हमें अपनी जीवनशैली पर ध्यान देने की जरूरत है। सही आदतें अपनाकर और नियमित देखभाल से हम अपनी त्वचा को लंबे समय तक जवान और स्वस्थ बनाए रख सकते हैं।

याद रखें, सुंदर त्वचा महंगे प्रोडक्ट्स से नहीं, बल्कि सही दिनचर्या और संतुलित जीवनशैली से मिलती है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

पानी को रोकने की मिट्टी की क्षमता का पता लगाना: एक वैज्ञानिक सफलता

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डॉ विजय गर्ग
कृषि और जल संरक्षण में परिवर्तन लाने वाली एक उपलब्धि के रूप में, वैज्ञानिकों ने मिट्टी में एक छिपे हुए तंत्र का पता लगाया है जो प्राकृतिक ग्लू की तरह काम करता है, तथा शुष्क परिस्थितियों में भी पानी को बनाए रखने में मदद करता है। यह खोज इस बात पर प्रकाश डालती है कि मिट्टी किस प्रकार उपजाऊ रहती है तथा सूखे से निपटने और फसल उत्पादकता में सुधार के लिए आशाजनक समाधान प्रस्तुत करती है।

इस घटना के केंद्र में छोटे कार्बनिक पदार्थ हैं, मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट और सूक्ष्मजीव यौगिक जो पौधों और मृदा सूक्ष्मजीवों द्वारा छोड़े जाते हैं। ये पदार्थ, जिन्हें अक्सर बायोपोलिमर कहा जाता है, एक चिपचिपा नेटवर्क बनाते हैं जो मिट्टी के कणों को एक साथ बांधता है। यह गोंद न केवल मिट्टी की संरचना को मजबूत करता है बल्कि इसके भीतर पानी को फंसाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हाल के शोध से पता चलता है कि यह प्रक्रिया हाइड्रोजन बंधन के माध्यम से सूक्ष्म स्तर पर काम करती है, जो एक कमजोर लेकिन महत्वपूर्ण बल है जो जल अणुओं को मिट्टी के खनिजों (जैसे मिट्टी) और कार्बनिक यौगिकों दोनों से एक साथ जुड़ने की अनुमति देता है। ये अंतःक्रियाएं छोटे-छोटे जलसेतुओं का निर्माण करती हैं, जो नमी को अपने स्थान पर लॉक कर देती हैं, तथा उसे आसानी से वाष्पित होने से रोकती हैं।

वैज्ञानिकों ने पाया कि जब कार्बोहाइड्रेट मौजूद होते हैं, तो मिट्टी पानी को अपने आप से पांच गुना अधिक मजबूती से रोक सकती है। उच्च तापमान या शुष्क परिस्थितियों में भी, इन सूक्ष्म स्थानों में फंसा पानी स्थिर रहता है, जिससे यह पौधों के लिए लंबे समय तक उपलब्ध हो जाता है।

इस प्राकृतिक गोंद में एक और महत्वपूर्ण योगदान सूक्ष्मजीव गतिविधि है। मृदा बैक्टीरिया बाह्यकोशिकीय बहुलक पदार्थ (ईपीएस) के रूप में जाने वाले पदार्थ उत्पन्न करते हैं। यह शर्करा और प्रोटीन का जेल जैसा मिश्रण है। ये यौगिक मिट्टी के कणों के चारों ओर एक बायोफिल्म बनाते हैं, तथा उन्हें समुच्चय नामक समूहों में बांधते हैं। ये समुच्चय छोटे स्पंजों की तरह काम करते हैं, जो पानी को रोकते हैं और वाष्पीकरण के माध्यम से इसके नुकसान को धीमा कर देते हैं।

वास्तव में, कुछ सूक्ष्मजीव अपने वजन से कई गुना अधिक पानी अवशोषित कर सकते हैं, जिससे मिट्टी की नमी का स्तर काफी बढ़ जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्यों स्वस्थ, जैविक तत्वों से भरपूर मिट्टी, क्षतिग्रस्त या रेतीली मिट्टी की तुलना में पानी को बेहतर ढंग से बरकरार रखती है।

इस खोज के निहितार्थ दूरगामी हैं। इस प्राकृतिक गोंद को समझकर और बढ़ाकर, वैज्ञानिक और किसान यह कर सकते हैं

मिट्टी की उर्वरता और फसल उपज में सुधार

सिंचाई की आवश्यकता को कम करें

सूखे और मरुभूमिकरण से लड़ें

टिकाऊ कृषि को बढ़ावा दें

कार्बनिक पदार्थ जोड़ने, सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को प्रोत्साहित करने, या यहां तक कि इन प्राकृतिक प्रक्रियाओं से प्रेरित पर्यावरण अनुकूल मृदा कंडीशनर विकसित करने जैसी तकनीकें किसानों को सीमित जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद कर सकती हैं।

दशकों से, किसान और माली एक सरल नियम पर निर्भर रहे हैं: खाद या गोबर जैसे कार्बनिक पदार्थों को मिलाने से मिट्टी पानी को बेहतर ढंग से रोक सकती है। यद्यपि क्षेत्र में परिणाम स्पष्ट थे, लेकिन सटीक “क्यों” अभी तक एक आणविक रहस्य बना हुआ है। पीएनएएस नेक्सस (अगस्त 2025) में प्रकाशित एक अभूतपूर्व अध्ययन में, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने उस विशिष्ट आणविक तंत्र की पहचान की है जो “गुप्त गोंद” के रूप में कार्य करता है, जिससे मिट्टी रेगिस्तान जैसी स्थितियों में भी नमी बनाए रख सकती है।

खोज: कार्बोहाइड्रेट आणविक पुलों के रूप में

प्रोफेसर लुडमिला एरिस्टिल्डे के नेतृत्व में शोध दल ने पाया कि कुछ कार्बोहाइड्रेट पौधों और सूक्ष्मजीवों के सामान्य घटक आणविक चिपकाने वाले पदार्थ के रूप में कार्य करते हैं। ये कार्बोहाइड्रेट पानी का उपयोग करके कार्बनिक अणुओं और मिट्टी के खनिजों (विशेष रूप से मिट्टी) के बीच चिपचिपा पुल बनाते हैं।

“ग्लू” कैसे काम करता है:

1। हाइड्रोजन बंधन: जल अणु आमतौर पर एक दूसरे से चिपक जाते हैं। हालाँकि, इस अध्ययन से पता चला है कि पानी एक साथ मिट्टी के खनिजों और कार्बोहाइड्रेट की सतह दोनों के साथ हाइड्रोजन बंधन बना सकता है। 2। ‘डबल ग्रिप’: जब पानी का एक अणु इन दो सतहों के बीच फंस जाता है, तो उसे ‘डबल पकड़’ द्वारा पकड़ा जाता है इससे एक मजबूत बाध्यकारी ऊर्जा उत्पन्न होती है, जिससे पानी के वाष्पित होने की संभावना बहुत कम हो जाती है। 3। क्विंटुपलिंग स्ट्रेंथ: आणविक सिमुलेशन से पता चला कि जटिल चीनी पॉलिमर (जैसे स्टार्च) मिट्टी को अकेले मिट्टी की तुलना में पांच गुना अधिक कसकर बांधने में मदद कर सकते हैं।

संरचनात्मक सहायता: छिद्र पतन को रोकना

रासायनिक बंधन के अलावा, इन कार्बोहाइड्रेट की भौतिक संरचना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टी “नैनोपोर्स” से भरी हुई है। यह छोटी-छोटी जेबें हैं जो पानी जमा करती हैं।

समस्या: सामान्यतः, जैसे-जैसे मिट्टी सूखती है, ये छोटे छिद्र सिकुड़ जाते हैं और ढह जाते हैं, जिससे बाद में मिट्टी का पुनः हाइड्रेट होना कठिन हो जाता है।
समाधान:** शोधकर्ताओं ने पाया कि लंबे, शाखाबद्ध कार्बोहाइड्रेट अणु सूक्ष्म मचान की तरह काम करते हैं। वे मिट्टी के नैनोपोर्स को पूरी तरह से ढहने से रोकते हैं, तथा अत्यधिक गर्मी के दौरान भी मिट्टी की “स्पंज” संरचना को बरकरार रखते हैं।

यह क्यों मायने रखता है: स्थानीय खेतों से लेकर मंगल ग्रह तक

यह खोज न केवल मृदा रसायन विज्ञान के लिए एक जीत है; बल्कि इसका वैश्विक खाद्य सुरक्षा और ग्रह विज्ञान पर भी बड़ा प्रभाव पड़ेगा

सूखा प्रतिरोधी इंजीनियरिंग:** इस “गोंद” को समझकर, वैज्ञानिक अब विशिष्ट मृदा रसायन विज्ञान की इंजीनियरिंग पर विचार कर सकते हैं। केवल “जैविक पदार्थ” जोड़ने के बजाय, किसान संभावित रूप से अपनी मिट्टी को विशिष्ट खनिज-कार्बोहाइड्रेट संतुलन के साथ ढाल सकते हैं, ताकि दीर्घकालिक नमी भंडार तैयार हो सकें।
सिंचाई में कमी:** इस प्राकृतिक गोंद को बढ़ाने से फसलों के लिए आवश्यक पानी की मात्रा में काफी कमी आ सकती है, जो एक महत्वपूर्ण कारक है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण शुष्क अवधि की आवृत्ति बढ़ जाती है।
अलौकिक जीवन: ये निष्कर्ष इस बात का संभावित स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं कि किस प्रकार पानी मंगल ग्रह पर या उल्कापिंड के भीतर अरबों वर्षों तक चट्टानों में फंसा रहा है। यदि कार्बनिक पदार्थ मौजूद होते, तो वह उन वातावरणों में पानी के लिए एक ही आणविक लंगर का काम कर सकता था।

भविष्य का दृष्टिकोण

नॉर्थवेस्टर्न की टीम प्रयोगशाला से क्षेत्र में जाने की योजना बना रही है, तथा यह परीक्षण करेगी कि वैश्विक स्तर पर विभिन्न मिट्टी प्रकारों में ये आणविक अंतःक्रियाएं किस प्रकार भिन्न होती हैं। यह शोध मिट्टी के बारे में हमारी समझ को विकास के लिए एक सरल माध्यम से एक परिष्कृत, रासायनिक रूप से इंजीनियर स्पंज में बदल देता है जो सबसे कठोर परिस्थितियों में जीवन को बनाए रखने में सक्षम है।

“इसका पता लगाने से, हम मिट्टी को सही रसायन विज्ञान के अनुसार इंजीनियर बना सकते हैं, तथा उसे दीर्घकालिक स्पंज में बदल सकते हैं जो नमी को संरक्षित करते हैं। — लुडमिला एरिस्टिल्ड, नॉर्थवेस्टर्न यूनिवर्सिटी

बढ़ती जल कमी और जलवायु चुनौतियों का सामना कर रही दुनिया में, मिट्टी में छिपा यह ॠग्लू-ग्लू कृषि के लिए अधिक लचीले और टिकाऊ भविष्य की कुंजी हो सकता है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रधान शैक्षिक स्तंभकार प्रख्यात शिक्षाशास्त्री स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब

अक्षय तृतीया: अन्नपूर्णा की आस्था, लाड़ली लक्ष्मी के सशक्तिकरण और मानवीय चेतना का महापर्व

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(डॉ. राघवेंद्र शर्मा-विभूति फीचर्स)
​भारतीय वाङ्मय में काल के प्रवाह को केवल अंकों या गणनाओं में नहीं बाँधा गया है, बल्कि इसे एक जीवंत इकाई माना गया है, जहाँ प्रत्येक तिथि अपने भीतर एक विशिष्ट ऊर्जा और आध्यात्मिक संदेश समेटे होती है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि, जिसे संपूर्ण भारत बड़े श्रद्धाभाव से ‘अक्षय तृतीया’ या ‘आखातीज’ के रूप में मनाता है, इसी जीवंत परंपरा का चरमोत्कर्ष है। ‘अक्षय’ शब्द अपने आप में पूर्णता का बोध कराता है,वह जिसका कभी क्षय न हो, जो समय की सीमाओं से परे सदा बना रहे। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, अपितु यह हमारी सांस्कृतिक विरासत, कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था, सामाजिक उत्तरदायित्व और आधुनिक प्रशासनिक सुधारों का एक अद्भुत संगम है, जो हमें विनाशशील भौतिकता से ऊपर उठकर अविनाशी सत्कर्मों की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की सरकार अक्षय तृतीया को ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के एक नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वर्ष 2026 की अक्षय तृतीया पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में सामूहिक विवाह और जनकल्याणकारी योजनाओं का समन्वय किया जा रहा है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना के माध्यम से न केवल बेटियों के हाथ पीले किए जा रहे हैं, बल्कि सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण और घरेलू सामग्री का वितरण उन्हें एक सुरक्षित और सुदृढ़ भविष्य की नींव प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, बाल विवाह के विरुद्ध ‘शून्य सहनशीलता’ की नीति अपनाकर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सूरत में मासूमों का भविष्य दांव पर नहीं लगने दिया जाएगा। इस दिन को लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं से जोड़कर महिलाओं के स्वावलंबन और उच्च शिक्षा के संकल्प के साथ मनाया जा रहा है।
​अक्षय तृतीया की महत्ता को समझने के लिए इसके पौराणिक और आध्यात्मिक धरातल को देखना आवश्यक है, जहाँ यह तिथि सत युग और त्रेता युग जैसे महान कालखंडों के आरंभ बिंदु के रूप में प्रतिष्ठित है। यह वह पावन दिन है जब भगवान विष्णु ने अपने छठे अवतार परशुराम के रूप में पृथ्वी पर अधर्म का नाश करने के लिए अवतार लिया था। इसी दिन पतित-पावनी गंगा का स्वर्ग से धरा पर आगमन हुआ, जिससे मानवता को शुचिता और जीवन का आधार प्राप्त हुआ। माता अन्नपूर्णा का प्राकट्य भी इसी तिथि को माना जाता है, जो हमें यह स्मरण कराता है कि संसार का पोषण केवल अन्न से नहीं, बल्कि सेवा और करुणा के भाव से होता है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह दिन स्वयं के भीतर के उस प्रकाश को जगाने का है जो कभी मंद नहीं पड़ता। शास्त्रों की मान्यता है कि इस दिन किया गया दान, जप और तप ‘अक्षय’ हो जाता है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि संसार में केवल वही संपदा हमारे साथ रहती है जिसे हमने निस्वार्थ भाव से दूसरों को अर्पित कर दिया है। भौतिक वस्तुएं समय के साथ लुप्त हो सकती हैं, लेकिन आत्मा के गुणों का संचय कभी समाप्त नहीं होता, यही इस पर्व का मूल आध्यात्मिक सार है।
​भारतीय समाज में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ की संज्ञा दी गई है, जो इसे ज्योतिषीय गणनाओं से भी ऊपर एक सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में स्थापित करती है। इस दिन किसी भी मांगलिक कार्य के लिए पंचांग देखने की आवश्यकता नहीं होती, क्योंकि सूर्य और चंद्रमा की स्थिति इस समय अपनी उच्चतम ऊर्जा में होती है। इसी सुलभता के कारण यह दिन सामूहिक विवाहों के लिए एक बड़े सामाजिक मंच के रूप में उभरा है। सामूहिक विवाह की यह परंपरा केवल आर्थिक सुलभता का साधन नहीं है, बल्कि यह आधुनिक समाज में बढ़ती फिजूलखर्ची और दिखावे की संस्कृति पर एक करारा प्रहार है। जब एक ही मंडप के नीचे विभिन्न आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के परिवार साथ आते हैं, तो जातिगत भेदभाव की दीवारें ढहने लगती हैं और एक समरस समाज की नींव पड़ती है। यह आयोजन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए गरिमापूर्ण जीवन की शुरुआत का माध्यम बनते हैं, जहाँ आडंबर के स्थान पर आशीष और सद्भाव को प्राथमिकता दी जाती है।
​हालाँकि, इस पावन तिथि के साथ ‘अबूझ मुहूर्त’ की आड़ में बाल विवाह जैसी कुरीति का काला साया भी जुड़ा रहा है, जो समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। बाल विवाह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह एक बच्चे के सुनहरे भविष्य, उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य के साथ किया जाने वाला घोर अपराध है। कम उम्र में विवाह के कारण विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा से वंचित होना पड़ता है, जिससे वे आर्थिक रूप से परावलंबी रह जाती हैं। साथ ही, अपरिपक्व अवस्था में स्वास्थ्य संबंधी जटिलताएं उनके जीवन को संकट में डाल देती हैं। आज का सजग समाज और सरकारें इस कुप्रथा को जड़ से मिटाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। ‘लाडो अभियान’ जैसे प्रयासों और प्रशासनिक निगरानी ने ग्रामीण अंचलों में एक नई चेतना का संचार किया है। अब यह सामूहिक उत्तरदायित्व बन गया है कि समाज का प्रत्येक घटक चाहे वह धर्मगुरु हो, पंडित हो या सेवा प्रदाता,बाल विवाह के विरुद्ध एक दीवार बनकर खड़ा हो। अक्षय तृतीया का वास्तविक उत्सव तभी सफल है जब प्रत्येक बच्चा अपनी शिक्षा और विकास का पूर्ण अवसर प्राप्त कर सके।
​वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मध्य प्रदेश की सरकार ने अक्षय तृतीया को ‘सामाजिक सशक्तिकरण’ के एक नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। वर्ष 2026 की अक्षय तृतीया पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश जिस तरह से सामूहिक विवाह और जनकल्याणकारी योजनाओं का समन्वय कर रहा है, वह अनुकरणीय है। मुख्यमंत्री कन्या विवाह और निकाह योजना के माध्यम से न केवल बेटियों के हाथ पीले किए जा रहे हैं, बल्कि सहायता राशि का सीधा हस्तांतरण और घरेलू सामग्री का वितरण उन्हें एक सुरक्षित और सुदृढ़ भविष्य की नींव प्रदान कर रहा है। इसके साथ ही, बाल विवाह के विरुद्ध ‘शून्य सहनशीलता’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाकर सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी सूरत में मासूमों का भविष्य दांव पर नहीं लगने दिया जाएगा। प्रशासन की सतर्कता और उड़न दस्तों की सक्रियता इस महापर्व की पवित्रता को बनाए रखने के लिए ढाल का काम कर रही है। यह सरकार की दूरदर्शिता ही है कि इस दिन को लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाओं से जोड़कर महिलाओं के स्वावलंबन और उच्च शिक्षा के संकल्प के साथ मनाया जा रहा है।
​अक्षय तृतीया का एक और महत्वपूर्ण पहलू कृषि संस्कृति से जुड़ा है। किसान इस दिन को नई फसल और नई उम्मीदों के प्रारंभ के रूप में देखते हैं। कृषि महोत्सवों के माध्यम से जैविक खेती और उन्नत बीजों का वितरण इस बात का प्रतीक है कि हमारी प्रगति की जड़ें आज भी मिट्टी से जुड़ी हैं। ‘अक्षय कृषि’ का विचार आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखने का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। जब हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विज्ञान और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ देते हैं, तो अक्षय तृतीया जैसा पर्व केवल एक दिन का उत्सव न रहकर समाज के सर्वांगीण विकास का इंजन बन जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि समृद्धि केवल स्वर्ण के क्रय में नहीं, बल्कि विचारों की शुद्धता और समाज के अंतिम व्यक्ति के प्रति हमारी संवेदनशीलता में निहित है।
​इस दृष्टि से देखा जाए तो अक्षय तृतीया भारतीय मेधा और संस्कृति का वह आलोक है जो हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। यह पर्व हमें यह विश्वास दिलाता है कि यदि हमारे कर्म सत्य और सेवा पर आधारित हैं, तो उनका प्रभाव शाश्वत रहेगा। सामूहिक विवाहों के माध्यम से बढ़ती सामाजिक एकता, बाल विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध प्रखर होती जन-चेतना और सरकारों द्वारा किए जा रहे सशक्तिकरण के प्रयास इस बात के प्रमाण हैं कि हम एक बेहतर समाज की ओर बढ़ रहे हैं। अक्षय तृतीया का यह महापर्व हमें संकल्प लेने के लिए प्रेरित करता है कि हम न केवल अपनी सुख-सुविधाओं का संचय करें, बल्कि ज्ञान, संस्कार और परोपकार की ऐसी पूंजी जमा करें जिसका कभी क्षय न हो। जब प्रत्येक व्यक्ति इस बोध के साथ जीवन व्यतीत करेगा, तभी अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश सार्थक होगा और हमारा राष्ट्र पुनः विश्व गुरु के पद पर आसीन होकर पूरे विश्व को शांति और शुभता का मार्ग दिखाएगा। सत्कर्मों की यह निरंतरता ही अक्षय तृतीया की सच्ची उपलब्धि है, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करती रहेगी। (विभूति फीचर्स)