देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन एक बार फिर गंभीर बहस के केंद्र में है। सवाल केवल चयन का नहीं, बल्कि उस चयन की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और सामाजिक संतुलन का है। हालिया परिणामों ने यह साफ संकेत दिया है कि लिखित परीक्षा से ज्यादा निर्णायक भूमिका निभाने वाला इंटरव्यू चरण अब सबसे अधिक विवादित होता जा रहा है।
सिस्टम की बुनियाद ही तब हिलने लगती है, जब मेहनत से लिखित परीक्षा में अच्छा प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थी अंतिम सूची से बाहर हो जाते हैं, जबकि औसत प्रदर्शन करने वाले उम्मीदवार इंटरव्यू के ऊंचे अंकों के सहारे शीर्ष पर पहुंच जाते हैं। 1750 अंकों की मुख्य परीक्षा और 275 अंकों के साक्षात्कार का यह समीकरण अब असंतुलित नजर आने लगा है, जहां इंटरव्यू एक निर्णायक हथियार बन चुका है,और यही सबसे बड़ा सवाल भी।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इंटरव्यू लेने वाली समितियों की संरचना पर अब तक गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। यदि चयन का अंतिम फैसला एक सीमित समूह करता है, जिसमें सामाजिक, क्षेत्रीय और भाषाई विविधता का अभाव हो, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यह केवल एक तकनीकी कमी नहीं, बल्कि पूरी चयन प्रणाली के मूल उद्देश्य पर सीधा प्रहार है।
भाषा का मुद्दा इस विवाद को और गहरा करता है। भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वाले अभ्यर्थियों के साथ मूल्यांकन में भेदभाव के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के उम्मीदवारों को इंटरव्यू में सहजता और बेहतर अभिव्यक्ति का लाभ मिलता है, जबकि ग्रामीण या हिंदी माध्यम के प्रतिभाशाली अभ्यर्थी उसी मंच पर पिछड़ जाते हैं। यह स्थिति समान अवसर के संवैधानिक सिद्धांत के विपरीत है।
इस पूरी प्रक्रिया में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है—सामाजिक प्रतिनिधित्व का अभाव। जब इंटरव्यू बोर्ड में अलग-अलग वर्गों, समुदायों, क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के लोग शामिल नहीं होते, तो मूल्यांकन का नजरिया सीमित हो जाता है। ऐसे में कई बार प्रतिभा को उसके वास्तविक संदर्भ में समझा ही नहीं जाता।
यही कारण है कि अब मांग उठ रही है कि इंटरव्यू बोर्ड का पुनर्गठन किया जाए। इसमें अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, महिलाओं और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को समान रूप से शामिल किया जाए। इससे न केवल पारदर्शिता बढ़ेगी, बल्कि अभ्यर्थियों को यह भरोसा भी मिलेगा कि उनका मूल्यांकन निष्पक्ष तरीके से हो रहा है।
इतिहास गवाह है कि सिविल सेवा परीक्षा की संरचना में समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं। कोठारी समिति की सिफारिशों पर आधारित वर्तमान ढांचा अब बदलते भारत की जरूरतों के अनुरूप पूरी तरह फिट नहीं बैठता। आज देश का सामाजिक और शैक्षणिक परिदृश्य बदल चुका है—ऐसे में चयन प्रक्रिया का भी आधुनिक और समावेशी होना जरूरी है।
ग्रामीण भारत के युवाओं की स्थिति इस पूरे मुद्दे का सबसे संवेदनशील पक्ष है। महानगरों में कोचिंग, संसाधन और मार्गदर्शन की उपलब्धता के कारण वहां के अभ्यर्थियों को स्वाभाविक बढ़त मिलती है। दूसरी ओर छोटे शहरों और गांवों के छात्र सीमित संसाधनों के बावजूद कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन इंटरव्यू जैसे चरण में वे अक्सर सिस्टम की खामियों का शिकार हो जाते हैं।
यह केवल परीक्षा की समस्या नहीं है यह प्रशासनिक ढांचे के भविष्य से जुड़ा सवाल है। यदि चयन प्रक्रिया में संतुलन और समान अवसर नहीं होगा, तो देश को विविध समाज का सही प्रतिनिधित्व करने वाले अधिकारी कैसे मिलेंगे?
अब समय आ गया है कि सरकार और आयोग इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें। इंटरव्यू बोर्ड में व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना केवल सुधार नहीं, बल्कि आवश्यकता बन चुका है। पारदर्शी मूल्यांकन प्रणाली, भाषा के आधार पर भेदभाव का अंत और सभी वर्गों की भागीदारी—यही वे कदम हैं, जो इस व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं।
यदि देश को निष्पक्ष, संवेदनशील और जमीनी समझ रखने वाले प्रशासनिक अधिकारी चाहिए, तो चयन प्रक्रिया को भी उतना ही न्यायपूर्ण बनाना होगा। इंटरव्यू बोर्ड में सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।


