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Sunday, April 19, 2026

स्त्री के मन का मंथन

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एक लाचार स्त्री करती क्या?
क्यूंकि एक स्त्री ने स्त्री को ही न समझा

वह बैठी थी खोई हुई,
अपने ही सवालों में उलझी हुई
कि क्या मैं ही देवी हूं?

अपने सवालों में उलझी हुई,
समझ न पायी स्वयं को

उलझते-उलझते उलझ गई,
एक नए जीवन के डोर में

अब न तो इच्छा न तो आशा,
बन गई स्वयं में एक कुहासा

शायद हर गई इस काया से,
पर जीत गई जीवन की माया से

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