एक लाचार स्त्री करती क्या?
क्यूंकि एक स्त्री ने स्त्री को ही न समझा
वह बैठी थी खोई हुई,
अपने ही सवालों में उलझी हुई
कि क्या मैं ही देवी हूं?
अपने सवालों में उलझी हुई,
समझ न पायी स्वयं को
उलझते-उलझते उलझ गई,
एक नए जीवन के डोर में
अब न तो इच्छा न तो आशा,
बन गई स्वयं में एक कुहासा
शायद हर गई इस काया से,
पर जीत गई जीवन की माया से


