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Wednesday, June 10, 2026
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गायब होती बेटियां: आख़िर किसकी बन रहीं शिकार

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डॉ सत्यवान सौरभ

भारत में बेटियों (Daughters) की सुरक्षा हमेशा से ही सबसे गंभीर मुद्दा रहा है। इसे लेकर कई कानून भी बनाए गए हैं, लेकिन बावजूद इसके देश में लड़कियों के लापता होने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। आंकड़ों के अनुसार के अनुसार भारत में पिछले दो साल के बीच 15.13 लाख से ज़्यादा लड़कियाँ और महिलाएँ लापता हुईं हैं। अब ये महिलाएँ कहाँ गई, इनके साथ क्या हुआ, इसके बारे में किसी को कुछ भी नहीं पता है। इन लापता लड़कियों में 18 साल से कम और उससे ज़्यादा दोनों उम्र की महिलाएँ शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर रोज़ 345 लड़कियाँ गायब हो जाती हैं। इनमें 170 लड़कियाँ किडनैप होती हैं, 172 लड़कियाँ लापता होती हैं और लगभग 3 लड़कियों की तस्करी कर दी जाती हैं। इनमें से कुछ लड़कियाँ तो मिल जाती हैं, लेकिन बड़ी संख्या में लापता, किडनैप और तस्करी की गई लड़कियों का कुछ पता नहीं चलता। इस संख्या की गणना गुमशुदा महिलाओं और लड़कियों के सम्बंध में पुलिस स्टेशनों में दर्ज रिपोर्टों के आधार पर की है।

हालांकि सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि असल संख्या अधिक हो सकती है क्योंकि कई परिवार सामाजिक कलंक समेत विभिन्न कारणों से लापता लड़कियों की रिपोर्ट दर्ज नहीं कराते हैं। आंकड़ों के अनुसार सबसे ज़्यादा महिलाएँ मध्य प्रदेश से लापता हुई हैं। एमपी के बाद लिस्ट में दूसरा स्थान बंगाल का है। इन राज्यों के अलावा राजधानी दिल्ली में भी लड़कियों और महिलाओं के गायब होने के कई मामले सामने आए हैं। आंकड़ों की मानें तो केंद्र शासित प्रदेशों में राजधानी दिल्ली इस लिस्ट में सबसे ऊपर है। रिपोर्ट चौंकाने वाली है। जो लड़कियाँ गायब होती हैं, उनमें से अधिकतर का पता नहीं चल पाता कि उनके साथ क्या हुआ है? वे कहाँ गई हैं? लापता होने के पीछे राज क्या हैं? 16 दिसम्बर 2012 को दिल्ली के निर्भया कांड ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इस घटना के बाद महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कई कठोर कानून बनाए गए, लेकिन सवाल ये है कि क्या कानूनों के बनाए जाने के बाद भी देश में महिलाओं की स्थितियाँ सुधरी हैं या महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों में कोई कमी नज़र आई है भारत में महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा को लेकर कई कानून बनाए गए हैं।

देश में हो रहे यौन अपराध को रोकने के लिए पुराने कानूनों में संशोधन भी किया गया और उसे कठोर भी बनाया गया है। इसके अलावा देश में 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ रेप की घटना में दोषी को मृत्युदंड सहित कई कठोर दंडात्मक प्रावधान भी तय किए गए हैं। देश भर में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई पहल की हैं, जिसमें यौन अपराधों के खिलाफ प्रभावी रोकथाम के लिए आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 शामिल है। इसके अलावा, आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 को 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के बलात्कार के लिए मौत की सजा सहित और भी अधिक कठोर दंड प्रावधानों को-को निर्धारित करने के लिए अधिनियमित किया गया था। अधिनियम में बलात्कार के मामलों में दो महीने में जांच पूरी करने और आरोप पत्र दाखिल करने और अगले दो महीने में सुनवाई पूरी करने का भी आदेश दिया गया है। सरकार ने आपातकालीन प्रतिक्रिया सहायता प्रणाली शुरू की है, जो सभी आपात स्थितियों के लिए एक अखिल भारतीय, एकल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त नंबर (112) आधारित प्रणाली प्रदान करती है, जिसमें संकटग्रस्त स्थान पर फील्ड संसाधनों को कंप्यूटर सहायता से भेजा जाता है।

स्मार्ट पुलिसिंग और सुरक्षा प्रबंधन में सहायता के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हुए, पहले चरण में आठ शहरों-अहमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता, लखनऊ और मुंबई में सुरक्षित शहर परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। फिर भी भारत में महिलाएँ आज से 10 साल पहले भी यौन अपराधियों का शिकार बनती रही है और आज भी हालात कुछ बहुत ऐसे ही हैं। देश में छेड़छाड़, अपहरण और दुष्कर्म जैसे मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

सरकार के तमाम दावों के बावजूद भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराध रुक नहीं रहे हैं। इसका एक मुख्य कारण इस मुद्दे को लेकर सभी राजनीतिक दलों में रुचि की कमी है। देश में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हर महिलाओं और लड़कियों को कुछ कानूनों के बारे में जानना बेहद ज़रूरी है। इन कानूनों में राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, महिला सुरक्षा कानून, पॉक्सो एक्ट कानून शामिल है

बिहार के पूर्व मंत्री के घर समेत 19 ठिकानों पर ईडी की रेड, बैंक घोटाला केस में एक्शन

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Alok Mehta

पटना। बिहार में ईडी ने बड़ी कार्रवाई करते हुए पूर्व मंत्री और आरजेडी नेता आलोक कुमार मेहता (Alok Mehta) के 19 ठिकानों पर छापेमारी की है। केंद्रीय जांच एजेंसी की यह कार्रवाई पटना और हाजीपुर में 9, कोलकाता में 5, वाराणसी 4 और दिल्ली में 1 ठिकाना पर चल रही है। पटना में मेहता के सरकारी और निजी आवास पर छापेमारी की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईडी ने वैशाली शहरी विकास सहकारिता बैंक में 85 करोड़ रुपए के घोटाले में एक्शन लिया है। आय से अधिक संपति के मामले में ED ने आलोक कुमार मेहता के घर पर रेड की है। आरबीआई की रिपोर्ट के बाद हाजीपुर में 3 एफआईआर दर्ज हुई थी।

सूत्रों के अनुसार, ईडी की टीम अलग-अलग ठिकानों पर रेड के दौरान दस्तावेजों की जांच में लगी हुई है। बिहार में पटना के अलावा, वैशाली जिले के महुआ के पास कोल्डस्टोरेज और महुआ के मिर्जानगर गांव में भी ईडी ने छापेमारी की है।

बता दें कि लालू यादव के करीबियों में से एक आलोक कुमार मेहता राज्य की महागठबंधन सरकार में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग के मंत्री थे।

आरजेडी के अंदर कई अहम फैसलों में भी मेहता की भूमिका होती है। वह समस्तीपुर के उजियारपुर सीट से विधायक हैं। वहीं, इस साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिससे पहले ईडी की कार्रवाई के कई मायने निकाले जा रहे हैं।

विश्व हिंदी दिवस पर विशेष तकनीक और हिन्दी: आवश्यक है भाषा सत्याग्रह

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विवेक रंजन श्रीवास्तव

10 जनवरी विश्व हिंदी दिवस क्यों …

वैश्विक स्तर पर हिंदी को लेकर पहला आयोजन 10 जनवरी 1974 को महाराष्ट्र के नागपुर में किया गया था। इस सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। तब से हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day) मनाया जाता है। भारत के पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 2006 में 10 जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की थी। उसके बाद से भारतीय विदेश मंत्रालय ने विदेश में 10 जनवरी 2006 को पहली बार विश्व हिन्दी दिवस मनाया था। अब यह वैश्विक स्तर पर हर वर्ष मनाया जाता है।

14 सितंबर को राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी दिवस (World Hindi Day) का आयोजन होता है, और हिन्दी दिवस मनाया जाता है क्योंकि इसी दिन वर्ष 1949 में भारत की संविधान सभा ने हिन्दी को देश की आधिकारिक भाषा घोषित किया था ।

राष्ट्र की प्रगति में तकनीकज्ञों का महत्वपूर्ण स्थान होता है। सच्ची प्रगति के लिये अभियंताओं और वैज्ञानिकों का राष्ट्र की मूल धारा से जुड़ा होना अत्यंत आवश्यक है। हमारे देश में आज भी तकनीकी शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी है। इस तरह अपने वैज्ञानिकों और अभियंताओं पर अंग्रेजी थोप कर हम उन्हें न केवल जन सामान्य से दूर कर देते हैं वरन अपने अभियंताओं एवं वैज्ञानिकों को पश्चिमी राष्ट्रों का रास्ता भी दिखा रहे हैं।

अंग्रेजी क्यो ?

इसके जवाब में कहा जाता है कि यदि हमने अंग्रेजी छोड़ दी तो हम दुनिया से कट जायेगें। किंतु क्या रूस, जर्मनी, फ्रांस, जापान, चीन इत्यादि देश वैज्ञानिक प्रगति में किसी से पीछे हैं ? क्या ये राष्ट्र विश्व से कटे हुये हैं। इन राष्ट्रों में तो तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी शिक्षा उनकी अपनी राष्ट्रभाषा में ही होती है,अंग्रेजी मे नहीं। आज इतने सुविकसित अंतर्भाषा टूल्स बन चुके हैं कि विश्व संपर्क वाला यह तर्क निरर्थक है ।

वास्तव मे विश्व संपर्क के लिये केवल कुछ बडे राष्ट्रीय संस्थान एवं केवल कुछ वैज्ञानिक व अभियंता ही जिम्मेदार होते हैं जो उस स्तर तक पहुचंते पहुंचते आसानी से अंग्रेजी सीख जाते हैं।

देश के केवल उच्च तकनीकी संस्थानों में वैकल्पिक रूप से अंग्रेजी को तकनीकी शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकारा जा सकता है । किंतु वर्तमान स्थितियों में हम व्यर्थ ही सारे योग्य विद्यार्थियों को उनके अमूल्य 6 वर्ष एक सर्वथा नई भाषा सीखने में व्यस्त रखते हैं। जबकि आज राष्ट्र भाषा हिन्दी में तकनीकी शिक्षण हेतु किताबें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं । यदि कोई कमी है भी तो उसे दूर करने के लिये पर्याप्त संसाधन और बुद्धिजीवी सक्रिय हैं । दुनिया के अन्य राष्ट्रों की तुलना में भारत से कहीं अधिक संख्या में अभियंता तथा वैज्ञानिक विदेशों मे जाकर बस जाते हैं। इस पलायन का एक बहुत बड़ा कारण उनका अंग्रेजी मे प्रशिक्षण भी है।

हमारे देश में शिक्षा की जो वर्तमान स्थिति है उसमें गांव गांव में भी अंग्रेजी माध्यम की शालायें खुल रही हैं , क्योंकि अंग्रेजी भाषा के माध्यम को रोजगार तथा व्यक्तित्व निर्माण के साधन के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। इसके पीछे अंग्रेजों का देश पर लम्बा शासन काल तो जिम्मेदार है ही साथ ही देश में भाषाई विविधता के चलते भाषाई आधार पर राज्यों के विभाजन की राजनीति भी जबाबदार लगती है। जिसके कारण हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा तो दिया गया पर उसे राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार नहीं किया गया और इसका लाभ अंग्रेजी को मिलता गया। विशेष रूप से तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में यही हुआ।

हिंदी को कठिन बताने के लिये प्रायः रेल के लिये लौहपथगामिनी जैसे शब्दों के गिने चुने दुरूह उदाहरण लिये जाते है , पर यथार्थ है कि हिंदी ने सदा से दूसरी भाषाओं को आत्मसात किया है। अतः ऐसे कुछ शब्द नागरी लिपि में लिखते हुये हिंदी मे यथावत अपनाये जाने चाहिए। किसी भी भाषा के विकास का यही मूल मंत्र भी है। अंग्रेजी में दुनिया भर की भाषाओं से हजारों शब्द यथावत रोमन स्पेलिंग के साथ आत्मसात किए ही जाते हैं। हिंदी शब्द तकनीक के लिये यदि अंग्रेजी वर्णमाला का प्रयोग करे तो हम अंग्रेजी अनुवाद टेक्नीक के बहुत निकट है। संत के लिये सेंट, अंदर के लिये अंडर, नियर के लिये निकट जैसे ढेरों उदाहरण है। शब्दों की उत्पत्ति के विवाद मे न पड़कर यह कहना उचित है कि हिंदी क्लिष्ट नही है।

हमने एक गलत धारणा बना रखी है कि नई तकनीक के जनक पश्चिमी देश ही होते है। यह भी परी तरह सही नहीं है। पुरातन ग्रंथों में भारत विश्व गुरू के दर्जे पर था। हमारे वैज्ञानिकों एवं तकनीकज्ञों में नवीन अनुसंधान करने की क्षमता है। तब प्रश्न उठता है कि क्यों हम अंग्रेजी ही अपनाये। क्यों न हम दूसरों की अन्वेषित तकनीक के अनुकरण की जगह अपनी क्षेत्रीय स्थितियों के अनुरूप स्वयं की जरूरतों के अनुसार स्वयं अनुसंधान करे जिससे उसे सीखने के लिये दूसरों को हिंदी अपनाने की आवश्यकता महसूस हो। कितने ही आविष्कार जनसाधारण द्वारा किए गए हैं।

जब अत्याधुनिक जटिल कार्य करने वाले कप्यूटरों की चर्चा होती है तो आम आदमी की भी उनमें सहज रूचि होती है एवं वह भी उनकी कार्यप्रणाली समझना चाहता है। किंतु भाषा का माध्यम बीच में आ जाता है और जन सामान्य वैज्ञानिक प्रयोगों को केवल चमत्कार समझ कर अपनी जिज्ञासा शांत कर लेता है। इसकी जगह यदि इन प्रयोगों की विस्तृत जानकारी देकर हम लोगों की जिज्ञासा को और बढा सके तो निश्चित ही नये नये अनुसंधान को बढावा मिलेगा। इतिहास गवाह है कि अनेक ऐसे खोजें हो चुकी है जो विज्ञान के अध्येताओं ने नही किंतु आवश्यकता के अनुरूप अपनी जिज्ञासा के अनुसार जनसामान्य ने की है।

यह विडंबना है कि ग्रामीण विकास के लिये विज्ञान जैसे विषयों पर अंग्रेजी मे बड़ी बड़ी संगोष्ठियां तो होती हैं किंतु इनमें जिनके विकास की बातें होती हैं वे ही उसे समझ नही पाते। मातृभाषा में मानव जीवन के हर पहलू पर बेहिचक भाव व्यक्त करने की क्षमता होती है। क्योंकि बचपन से ही व्यक्ति मातृभाषा मे बोलता पढ़ता लिखता और समझता है। फिर विज्ञान या तकनीक ही मातृभाषा में नहीं समझ सकता ऐसा सोचना नितांत गलत है।

आज हिंदी अपनाने की प्रक्रिया का प्रांरभ त्रैमासिक या छैमाही पत्रिका के प्रारंभ से होता है जो दो चार अंकों के बाद साधनों के अभाव में बंद हो जाती है। यदि हम हिंदी अपनाने के इस कार्य के प्रति ऐसे ही उदासीन रहे तो भावी पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेगी। हिंदी अपनाने के महत्व पर भाषण देकर या हिंदी संस्थानों के कार्यक्रमों में हिंदी दिवस मनाकर हिंदी के प्रति हमारे कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो सकती। हमें सच्चे अर्थों में प्रयोग के स्तर पर हिंदी को अपनाना होगा। तभी हम मातृभाषा हिंदी को उसके सही स्थान पर पहुंचा पायेंगे।

हिंदी ग्रंथ अकादमी हिंदी मे तकनीकी साहित्य छापती है। बड़ी-बड़ी प्रदर्शनियां इस गौरव के साथ लगाई जाती है कि हिंदी में तकनीकी साहित्य उपलब्ध है। किंतु इन ग्रंथो का कोई उपयोग नहीं करता। यहां तक कि इन पुस्तकों के दूसरे संस्करण तक छप नहीं पाते। क्योंकि विश्वविद्यालयों में तकनीकी का माध्यम अंग्रेजी ही है। यह स्थिति चिंता जनक है। हिंदी को प्रायः साम्प्रदायिकता,क्षेत्रीयता एवं जातीयता के रंग में रंगकर निहित स्वार्थों वाले राजनैतिक लोग भाषाई ध्रुवीकरण करके अपनी रोटियां सेंकते नजर आते हैं। हमें एक ही बात ध्यान में रखनी है कि हम भारतीय हैं। हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है यदि राष्ट्रीयता की मूल भावना से हिंदी को अपनाया जावेगा तो यही हिंदी राष्ट्र की अखंडता और विभिन्नता में एकता वाली हमारी संस्कृति के काश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले विभिन्न रूपों को परस्पर और निकट लाने में समर्थ होगी।

यही हिंदी भारतीय ग्रामों के सच्चे उत्थान के लिये नये विज्ञान और नई तकनीक को जन्म देगी। हमें चाहिये कि एक निष्ठा की भावना से कृत संकल्प होकर व्यवहारिक दृष्टिकोण से हिंदी को अपनाने में जुट जावे। अंग्रेजी के इतने गुलाम मत बनिये कि कल जब आप हिंदी की मांग करने निकले तो चिल्लाये कि वी वांट हिंदी। भाषाएं परस्पर समन्वय और सौहाद्र बढ़ाने का टूल बनें इसलिए अनुवाद को बढ़ावा देना जरूरी है। हिंदी के प्रयोग को विस्तार देने हेतु भाषा सत्याग्रह करना होगा।

जद्दोजहद के बाद फर्रूखाबाद में मंडल अध्यक्षों की नई सूची जारी

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युवा अनुज कटियार को जहानगंज की जिम्मेदारी

फर्रूखाबाद(प्रशांत कटियार)। भाजपा मंडल अध्यक्ष पद के लिए जारी की गई सूची ने काफी चर्चा पैदा की है। प्रदेश चुनाव अधिकारी डॉ. महेन्द्र नाथ पांडेय ने मंडल अध्यक्ष पद नियमो के तहत उम्र सीमा 35 से 45 वर्ष निर्धारित की गई थी। जो लोग लगातार दो बार मंडल अध्यक्ष रह चुके हैं, उन्हें नामांकन करने की अनुमति नहीं दी गई थीं। इससे कई दावेदारों की मुश्किलें बढ़ गई थी। क्योंकि उम्र के बंधन और सक्रिय सदस्यता की शर्तों के चलते कई लोग अपनी उम्मीदवारी से वंचित रह गए हैं। लेकिन दो जन प्रतिनिधियों नियमो को ताक पर रख मंडल अध्यक्ष बनवाने में सफल रहे।फर्रूखाबाद में यह मुद्दा सोशल मीडिया पर भी काफी गरमाया रहा और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल उठाए जाते रहे । अब सूची जारी हो चुकी है, यह स्पष्ट हो गया है कि स्थानीय जन प्रतिनिधियों की खूब चली है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने फर्रूखाबाद में विभिन्न मंडलों के लिए नए मंडल अध्यक्षों की सूची जारी की है। इस सूची में 15 मंडलों के अध्यक्षों के नाम और उनके कार्यक्षेत्र की जानकारी शामिल है। पार्टी ने यह कदम संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने और आगामी चुनावों में बेहतर प्रदर्शन के लिए उठाया है। जिला अध्यक्ष रूपेश गुप्ता ने कहा कि नए अध्यक्षों का चयन कार्यकर्ताओं की मेहनत और समर्पण के आधार पर किया गया है। पार्टी का लक्ष्य है कि सभी मंडलों में सक्रियता बढ़ाई जाए और कार्यकर्ताओं को अधिक से अधिक सशक्त किया जाए।

 

सदर विधान सभा

फर्रुखाबाद नगर पश्चिम: वीर बहादुर पाल बने मंडल अध्यक्ष।

– फतेहगढ़ नगर: रमला राठौर बनीं मंडल अध्यक्ष।

– बढ़पुर पश्चिम: सर्वेश कुमार उर्फ संतोष राजपूत बने मंडल अध्यक्ष।

– अमृतपुर विधानसभा

– नीम करोरी: भूपेंद्र सिंह चौहान बने मंडल अध्यक्ष।

– सलेमपुर: लालू राजपूत बने मंडल अध्यक्ष।

– अमृतपुर: नीरज अवस्थी बने मंडल अध्यक्ष।

-भोजपुर विधानसभा

– कमालगंज: राजेश कुमार वर्मा बने मंडल अध्यक्ष।

– जहानगंज: अनुज कटियार बने मंडल अध्यक्ष।

– मोहम्मदाबाद उत्तरी: राम प्रकाश सिंह राठौर बने मंडल अध्यक्ष।

– मोहम्मदाबाद दक्षिणी: शैलेंद्र मिश्रा बने मंडल अध्यक्ष।

– कायमगंज विधानसभा

– अचरा: कुनेंद्र गंगवार बने मंडल अध्यक्ष।

– कंपिल: निर्मल कश्यप बने मंडल अध्यक्ष।

– कायमगंज ग्रामीण: महेंद्र राजपूत बने मंडल अध्यक्ष।

– कायमगंज नगर: देवेंद्र दुबे बने मंडल अध्यक्ष।

– शमशाबाद: आदेश शाक्य बने मंडल अध्यक्ष।

 

 

एक ही परिवार के 5 लोगों की गला रेतकर हत्या, घर में मिली पति-पत्नी और 3 बेटियों की लाश

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मेरठ। जिले के लिसाड़ी थाना क्षेत्र के अंतर्गत सोहेल गार्डन में एक ही परिवार के पांच लोगों की लाशें मिली हैं। हत्या (Murder) कर शव बोरे में बंद कर बेड में छिपाए गए। पूरा परिवार बुधवार से लापता बताया गया था।

गुरुवार रात्रि साढ़े नाै बजे उनके शव उनके ही मकान के एक कमरे में पर बेड के भीतर बोरों में बंद शव मिले हैं। इनमें बच्चे भी शामिल हैं। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंच कर जांच पड़ताल कर रही है। पुलिस जांच में हत्या की बात सामने आई है।

घटना की जानकारी लगते ही आसपास के लोग माैके पर इकट्ठा हो गए। पुलिस माैके पर पहुंची और छानबीन की। पूछताछ में पड़ोसियों ने पुलिस को बताया कि बुधवार से पूरा परिवार गायब था। किसी ने इन्हें नहीं देखा। आज लाश मिलने की बात सामने आई है।

प्लास्टिक के बोरों में बंद थी 4 लाशें

अभी तक सामने आई घटना की तस्वीरों और पुलिस की प्राथमिक जांच के अनुसार जिस जगह लाशें मिलीं हैं। वहां बर्तन, इंडक्शन आदि सामान बिखरा हुआ है। चार लाशें प्लास्टिक के बोरों में बंद मिली हैं जबकि एक मासूम का शव बिना बोरे के मिला है। बताया गया कि सभी की गला काटकर हत्या की गई है।

पुलिस अधिकारी भी माैके पर पहुंच रहे हैं। क्षेत्र के सीसीटीवी कैमरों की भी जांच पड़ताल की जा रही है। पड़ोसियों का कहना है कि उन्होंने बुधवार से ही किसी को घर से बाहर निकलते और न ही किसी को भीतर जाते हुए देखा।

पुलिस के मुताबिक प्रथम दृष्टया जांच में हत्या कर शव बेड में छिपाने की बात सामने आ रही है। हत्या के लिए पत्थर काटने वाली मशीन का प्रयोग किया गया है। हत्या किस वजह से हुई है, यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल पुलिस शवों को पोस्टमार्टम के लिए भिजवाने की तैयारी कर रही है। जांच पड़ताल की जा रही है।

कुमार विश्वास के पतंजलि नमक पर मजाक, बाबा रामदेव का जवाब: “इनके पिता घर में जूतियाते हैं

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बाबा रामदेव का कुमार विश्वास पर तंज: ‘धंधा चलाने के लिए बोलना जरूरी’

कवि कुमार विश्वास ने हाल ही में बाबा रामदेव के पतंजलि नमक पर टिप्पणी की, जिसके बाद योग गुरु ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। बाबा रामदेव ने कहा कि जब तक विश्वास ऐसी कुछ बातें नहीं करेंगे, उनका धंधा कैसे चलेगा। उन्होंने विश्वास के परिवार की श्रद्धा का भी जिक्र किया और कहा कि उनकी मां और पिता दोनों ही उनके भक्त हैं।

एक कार्यक्रम में बाबा रामदेव ने स्पष्ट किया, “इनके पिताजी जब  इनको जुतियाते हैं कि तू बाबा के बारे में उल्टा बोलना छोड़ दे।  और मेरे हाथ जोड़कर आते हैं। जब तक दो-चार बातें नहीं कहेंगे, तो इनका धंधा कैसे चलेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि वे कवि की बातों से नाराज नहीं हैं, और जो नाराज होते हैं, वे महाराज नहीं होते।

कुमार विश्वास ने नवरात्रि के दौरान पतंजलि नमक को लेकर कहा, “उनका प्रोडक्ट ऐसे बेचते हैं कि अगर आप उनसे नहीं खरीदते, तो मानो सनातन से आपका इस्तीफा। नमक के पैकेट पर लिखा था कि यह 25 लाख साल पुराना हिमालय से निकाला गया है। लोग भावुक हो जाते हैं और चित्र बनाने लगते हैं। ऊपर 25 लाख साल पुराना और नीचे लिखा था 7 फरवरी।”