
डॉ विजय गर्ग
जीवन अक्सर हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है, जहां पीछे मुड़कर देखने पर ही उसकी असली कीमत समझ आती है। बचपन के वे दिन, जब घर में सुविधाएं कम थीं, जेब में पैसे नहीं होते थे, लेकिन दिल में एक अजीब-सी शांति और सुकून होता था—क्योंकि मां साथ होती थी।
मां… एक ऐसा शब्द, जिसमें पूरी दुनिया की ममता समाई होती है। जब वह थी, तब शायद हमने उसकी कीमत नहीं समझी। उसकी डांट में छुपा प्यार, उसके हाथों का बना सादा खाना, उसकी छोटी-छोटी चिंताएं—सब कुछ हमें सामान्य लगता था। हम सोचते थे कि जब हमारे पास पैसे होंगे, अच्छी नौकरी होगी, तब हम उसे खुश रखेंगे, उसकी हर इच्छा पूरी करेंगे।
लेकिन समय किसी के लिए नहीं रुकता।
आज हमारे पास पैसे हैं, सुख-सुविधाएं हैं, बड़े घर हैं, महंगे कपड़े हैं—लेकिन मां नहीं है। अब वह आवाज नहीं आती जो पूछती थी, “खाना खा लिया?” अब वह हाथ नहीं हैं जो सिर पर रखकर आशीर्वाद देते थे। अब कोई नहीं है जो बिना कहे हमारी हर परेशानी समझ ले।
पैसा बहुत कुछ खरीद सकता है—सुख-सुविधाएं, आराम, नाम और शोहरत। लेकिन मां का प्यार, उसकी ममता, उसकी उपस्थिति—ये सब अमूल्य हैं, जिन्हें कोई धन वापस नहीं ला सकता।
अक्सर हम अपने जीवन की दौड़ में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि अपने सबसे करीब के रिश्तों को नजरअंदाज कर देते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि जिनके लिए हम सब कुछ कर रहे हैं, वे ही हमारे पास हमेशा नहीं रहेंगे।
यह लेख सिर्फ एक भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि एक संदेश है—जब तक मां हमारे साथ है, उसके साथ समय बिताएं, उसकी कद्र करें, उसके त्याग को समझें। उसे यह महसूस कराएं कि वह हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है।
क्योंकि एक दिन ऐसा भी आएगा जब हम सब कुछ हासिल कर लेंगे, लेकिन मन के किसी कोने में एक खालीपन रह जाएगा—जिसे कोई भी दौलत नहीं भर पाएगी।
मां का होना ही असली दौलत है।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब


