प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव इन संबंधों को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा है कि यदि किसी लिव इन रिश्ते में पुरुष की उम्र 21 वर्ष से कम है, तो ऐसे संबंध को कानूनी सुरक्षा नहीं दी जा सकती। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून जिस उम्र से पहले विवाह की अनुमति नहीं देता, उस स्थिति में अदालत किसी रिश्ते को अप्रत्यक्ष रूप से वैधता नहीं दे सकती।
यह आदेश न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की एकल पीठ ने बिजनौर निवासी 20 वर्षीय युवती और 19 वर्षीय युवक की याचिका पर सुनाया। दोनों लिव इन संबंध में रह रहे थे और उन्होंने अदालत से मांग की थी कि उनके परिजनों को उनके शांतिपूर्ण जीवन में हस्तक्षेप करने से रोका जाए तथा उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। याचियों का कहना था कि वे बालिग हैं और अपनी पसंद से साथ रहने का अधिकार रखते हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने बाल विवाह निषेध अधिनियम-2006 का हवाला देते हुए कहा कि 21 वर्ष से कम आयु का पुरुष कानूनन “बच्चा” माना जाता है। अदालत ने कहा कि केवल इस वजह से किसी रिश्ते को लिव इन का नाम देकर सुरक्षा नहीं दी जा सकती कि कानून उस उम्र में विवाह की अनुमति नहीं देता। ऐसा करना अवैध विवाह जैसी व्यवस्था को अप्रत्यक्ष मान्यता देने जैसा होगा।
हालांकि हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद-21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सभी को प्राप्त है। यदि याचियों के साथ हिंसा, जबरन हिरासत या किसी प्रकार की गैरकानूनी कार्रवाई होती है तो वे पुलिस से शिकायत कर सकते हैं और पुलिस को तत्काल कार्रवाई करनी होगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता या अभिभावकों को कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करने से नहीं रोका जा सकता।
हाईकोर्ट के इस फैसले को लिव इन संबंधों और वैधानिक विवाह आयु को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी माना जा रहा है।


