शरद कटियार
मौत का आंकड़ा 389 के पार, 1,468 लोग लापता; चीन सीमा पर बनी झील ने बढ़ाई चिंता, भारत ने तेज किया राहत अभियान
नेपाल इन दिनों प्रकृति के ऐसे प्रकोप से जूझ रहा है, जिसने देश के बड़े हिस्से को गहरे संकट में डाल दिया है। भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने सैकड़ों जिंदगियां छीन ली हैं, हजारों परिवारों को संकट में डाल दिया है और सड़क, पुल, बिजली तथा संचार जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचाया है। सबसे चिंता की बात यह है कि पहली आपदा से उबरने की कोशिश कर रहा नेपाल अब एक नई और संभावित बड़ी बाढ़ के खतरे के सामने खड़ा है।
नेपाल पुलिस के अनुसार अब तक 389 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि नेपाल और चीन के तिब्बत क्षेत्र में करीब 1,468 लोग लापता अथवा संपर्क से बाहर बताए जा रहे हैं। ये आंकड़े केवल नुकसान का हिसाब नहीं हैं, बल्कि उस मानवीय त्रासदी की गंभीरता को सामने रखते हैं जिसमें न जाने कितने परिवार अपनों की तलाश में हैं।
इस त्रासदी का अगला अध्याय नेपाल-चीन सीमा के पास लिखा जा सकता है। रसुवागढ़ी सीमा से करीब 18 किलोमीटर ऊपर ल्हेंदे खोला नदी में पानी रुकने से एक नई झील बन गई है। बताया जा रहा है कि इसका क्षेत्रफल करीब 0.11 वर्ग किलोमीटर है और इसमें लगभग 20 लाख घन मीटर पानी जमा हो चुका है।
चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि अगले कुछ दिनों में इसमें पानी की मात्रा और बढ़ने का अनुमान है। यदि इस झील का प्राकृतिक बांध अचानक टूट गया तो भोटेकोशी नदी में पानी का सैलाब बेहद तेजी से नीचे की ओर बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में पहले से बाढ़ की मार झेल रहे निचले इलाकों में एक और बड़ी तबाही का खतरा पैदा हो जाएगा।
नेपाल के जल तथा मौसम विज्ञान विभाग की ओर से भी निचले इलाकों के लोगों को नदी के किनारे से दूर रहने और सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है। यह चेतावनी बताती है कि खतरा केवल बीती हुई बाढ़ तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले घंटे और दिन भी बेहद महत्वपूर्ण हैं।
चितवन में 137 शव बरामद होने की सूचना है, जबकि पूर्वी नवलपरासी में 87 लोगों की मौत हुई है। धादिंग में 33, गोरखा में 32, नुवाकोट और तनहुं में 28-28, पश्चिमी नवलपरासी में 27 तथा रसुवा में 17 शव मिलने की जानकारी सामने आई है।
इसके अलावा 466 घायलों को प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षित निकालने की बात कही गई है। लेकिन राहत अभियान के सामने सबसे बड़ी चुनौती दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्र हैं, जहां सड़कें और पुल टूट चुके हैं। कई स्थानों पर बचाव दलों को पैदल पहुंचना पड़ रहा है।
नेपाल में 910 और तिब्बत क्षेत्र में 558 लोगों के लापता अथवा संपर्क से बाहर होने की सूचना स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाती है। हर गुजरते घंटे के साथ राहत दलों पर दबाव बढ़ रहा है कि वे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचें।
नेपाल में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक भी फंसे हुए हैं। अब तक 84 भारतीयों को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी है, जबकि 290 भारतीयों से संपर्क नहीं हो पाने की बात सामने आई है। इनमें त्रिशूली-1 परियोजना से जुड़े कर्मचारी और कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए लोग भी शामिल हैं।
ऐसे समय में भारत की भूमिका केवल अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पड़ोसी देश की मानवीय मदद में भी सक्रिय रहना जरूरी है। राहत सामग्री, बेली ब्रिज और बचाव संसाधन भेजने की तैयारी इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से नियंत्रण कक्ष और हेल्पलाइन की व्यवस्था भी प्रभावित परिवारों के लिए जरूरी सहारा है। आपदा की स्थिति में सबसे बड़ी जरूरत सही सूचना की होती है। अफवाह और अनिश्चितता संकट को और गहरा कर सकती है।
नेपाल ने राहत और बचाव अभियान में 13,295 से अधिक सुरक्षाकर्मियों को लगाया है। सेना और पुलिस के जवान हेलिकॉप्टरों तथा पैदल माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर लोगों को निकाल रहे हैं।
नुवाकोट और रसुवा जैसे क्षेत्रों में बिजली और संचार व्यवस्था प्रभावित होने के कारण बचाव अभियान की कठिनाई और बढ़ गई है। ऐसे क्षेत्रों में सौर ऊर्जा से चलने वाले पावर बैंक जैसी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण व्यवस्थाएं भी जीवनरेखा साबित हो सकती हैं।
आपदा के समय केवल लोगों को निकालना ही पर्याप्त नहीं होता। उनके लिए भोजन, पानी, दवाएं, बिजली, संचार और अस्थायी आश्रय की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। इसलिए राहत अभियान को केवल तत्काल बचाव तक सीमित रखने के बजाय आने वाले दिनों की जरूरतों को ध्यान में रखकर चलाना होगा।
बुधवार सुबह नेपाल-चीन सीमा के पास आए तेज कंपन ने भी लोगों को डरा दिया था। शुरुआत में इसे भूकंप समझा गया, लेकिन बाद में सामने आया कि पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा बर्फ और चट्टानों के साथ नदी में गिरा था। इसी बड़े भूस्खलन से भूकंप जैसा कंपन महसूस हुआ।
यह घटना हिमालयी क्षेत्र की नाजुक भौगोलिक स्थिति की ओर भी इशारा करती है। लगातार बदलता मौसम, भारी बारिश, भूस्खलन और पहाड़ी नदियों का उफान एक-दूसरे से जुड़े हुए खतरे हैं। इसलिए नेपाल में आपदा प्रबंधन को केवल बाढ़ आने के बाद सक्रिय होने वाली व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जा सकता।
नेपाल की वर्तमान त्रासदी एक चेतावनी भी है। हिमालयी क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है। पहाड़ों में सड़कें, पुल, जलविद्युत परियोजनाएं और अन्य बुनियादी ढांचे जरूरी हैं, लेकिन इनके निर्माण में प्राकृतिक जलधाराओं, भूगर्भीय संवेदनशीलता और बदलते मौसम के प्रभावों को नजरअंदाज करना भविष्य में भारी पड़ सकता है।
नई बनी झील सबसे बड़ा उदाहरण है। कुछ ही समय में नदी का रास्ता रुककर विशाल जलराशि में बदल जाना और फिर उसके टूटने की आशंका पैदा होना बताता है कि पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक घटनाएं कितनी तेजी से बड़े संकट का रूप ले सकती हैं।
इसलिए नेपाल को तत्काल राहत के साथ-साथ पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी निगरानी, भूस्खलन मानचित्रण, सुरक्षित पुनर्वास और सीमा पार आपदा समन्वय को मजबूत करना होगा। भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों के साथ वास्तविक समय में सूचना साझा करने की व्यवस्था भी भविष्य में जान बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
नेपाल और भारत के संबंध केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और मानवीय रिश्तों से भी जुड़े हैं। ऐसे संकट में भारत द्वारा राहत सामग्री और बचाव संसाधन उपलब्ध कराना पड़ोसी धर्म से आगे बढ़कर मानवीय जिम्मेदारी का उदाहरण है।
आज नेपाल को सबसे ज्यादा जरूरत राजनीति की नहीं, बल्कि सहयोग, संवेदना और समन्वित राहत प्रयासों की है। मृतकों की संख्या और लापता लोगों के आंकड़े बढ़ाने वाली खबरों के बीच असली प्राथमिकता उन लोगों तक पहुंचना है जो अब भी कहीं मलबे, बाढ़ या कटे हुए इलाकों में मदद का इंतजार कर रहे हैं।
प्रकृति के कहर को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसकी चेतावनियों को समझकर नुकसान जरूर कम किया जा सकता है। नेपाल की इस त्रासदी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि आपदा आने के बाद राहत पहुंचाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है आपदा आने से पहले खतरे को पहचानना और लोगों को सुरक्षित करना।


