फर्रुखाबाद। जनपद में निजी और छोटे बड़े अस्पतालों की संख्या तेजी से बढ़ी है। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के अनुसार जिले में करीब 92 ऐसे अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित हैं जहां छोटे-बड़े ऑपरेशन किए जाते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन ऑपरेशनों में एनेस्थीसिया कौन दे रहा है? स्थिति यह है कि पूरे जिले में गिने-चुने डॉक्टरों पर ही लगभग पूरा सिस्टम टिका हुआ दिखाई देता है।
जानकारी के मुताबिक एनेस्थीसिया विशेषज्ञों में मुख्य रूप से तीन नाम सबसे अधिक सक्रिय बताए जाते हैं। इनमें माया अस्पताल के संचालक डॉ. सतीश राजपूत, डॉ. अनिल मिश्रा और डॉ. उमाशंकर तिवारी शामिल हैं। चिकित्सा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि डॉ. सतीश राजपूत और डॉ. अनिल मिश्रा आमतौर पर जिले से बाहर नहीं जाते और स्थानीय स्तर पर ही सेवाएं देते हैं। ऐसे में बाकी अस्पतालों में ऑपरेशन की व्यवस्था को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं।
वहीं राजेपुर सीएचसी में तैनात डॉ. एसपी सिंह और कमालगंज क्षेत्र में तैनात डॉ. अरुण यादव का नाम भी एनेस्थीसिया सेवाओं से जोड़ा जाता है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि सरकारी तैनाती और पहले से मिलने वाली भारी सैलरी के कारण वे निजी अस्पतालों में नियमित रूप से नहीं जाते। यही कारण है कि जिले के कई अस्पतालों में ऑपरेशन के दौरान विशेषज्ञ एनेस्थेटिस्ट की उपलब्धता पर गंभीर संदेह खड़े हो रहे हैं।
स्वास्थ्य विभाग के जानकारों का कहना है कि एनेस्थीसिया किसी भी सर्जरी का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है। यदि प्रशिक्षित विशेषज्ञ मौजूद न हो तो मरीज की जान तक जा सकती है। इसके बावजूद कई छोटे अस्पतालों में कथित रूप से “मैनेजमेंट” के आधार पर ऑपरेशन होने की चर्चाएं लंबे समय से चल रही हैं।
सूत्रों का दावा है कि कई अस्पतालों में ऑपरेशन के समय या तो बाहर से डॉक्टर बुलाए जाते हैं, या फिर नाम किसी विशेषज्ञ का होता है और काम कोई अन्य करता है। यह भी चर्चा है कि कुछ जगहों पर बिना पूर्ण मानकों के ही सर्जरी संचालित हो रही हैं। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
अब बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब पूरे जिले में ऑपरेशन करने वाले अस्पतालों की संख्या 90 से अधिक है, तो क्या स्वास्थ्य विभाग के पास यह स्पष्ट रिकॉर्ड है कि किस अस्पताल में अधिकृत एनेस्थीसिया विशेषज्ञ उपलब्ध हैं? क्या सीएमओ कार्यालय नियमित निरीक्षण करता है? और यदि विशेषज्ञों की संख्या सीमित है तो बाकी अस्पतालों को संचालन की अनुमति किन आधारों पर दी गई?
स्वास्थ्य व्यवस्था की यह तस्वीर केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनती जा रही है। यदि समय रहते जांच और मानकों का सत्यापन नहीं हुआ, तो कभी भी कोई बड़ा मामला सामने आ सकता है।


