डॉ. अनूप पटेल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका प्रभाव केवल चुनावी जीत-हार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वे राजनीतिक विमर्श और सामाजिक प्रतिनिधित्व की नई धारा स्थापित कर जाते हैं। डॉ. सोनेलाल पटेल ऐसे ही नेताओं में शामिल थे। वे न कभी मुख्यमंत्री बने, न सांसद और न ही विधायक, लेकिन गैर-यादव पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाने का श्रेय उन्हें दिया जाता है।
2 जुलाई 1950 को कन्नौज जनपद के बागुलहाई गांव में जन्मे डॉ. सोनेलाल पटेल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद सामाजिक असमानता और जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता चुना। किसान नेता चौधरी चरण सिंह के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने राजनीति में कदम रखा और बाद में कांशीराम के साथ बहुजन आंदोलन को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक नेताओं में भी गिना जाता है।
डॉ. पटेल सामाजिक न्याय, सम्मान, प्रतिनिधित्व और सत्ता में समान भागीदारी के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी वर्गों की सत्ता संरचना में समान हिस्सेदारी सुनिश्चित होनी चाहिए।
वर्ष 1995 में बहुजन राजनीति के भीतर नेतृत्व और प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद उभरे। इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ की ऐतिहासिक कुर्मी स्वाभिमान रैली ने नई राजनीतिक दिशा दी। इसके बाद 4 नवंबर 1995 को डॉ. सोनेलाल पटेल ने अपना दल की स्थापना की। यह केवल एक नई पार्टी नहीं, बल्कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों के राजनीतिक सशक्तिकरण का आंदोलन था।
डॉ. पटेल पर डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों का गहरा प्रभाव था। उन्होंने सामाजिक समानता और जाति-विरोध के विचारों को आगे बढ़ाते हुए बौद्ध धर्म भी अपनाया। हालांकि अपने जीवनकाल में उन्हें बड़ी चुनावी सफलता नहीं मिली, लेकिन उनका राजनीतिक प्रभाव लगातार बढ़ता गया और उत्तर प्रदेश की राजनीति में गैर-यादव पिछड़े वर्गों की भूमिका निर्णायक होती चली गई।
18 अक्टूबर 2009 को कानपुर के निकट एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया। आधिकारिक रूप से इसे दुर्घटना माना गया, जबकि बाद में उनके परिवार के कुछ सदस्यों ने इसकी सीबीआई जांच की मांग भी उठाई।
उनके निधन के बाद अपना दल का नेतृत्व उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बाद में बेटी अनुप्रिया पटेल के हाथों में आया। वर्ष 2014 में भाजपा के साथ गठबंधन के बाद पार्टी राष्ट्रीय राजनीति का हिस्सा बनी। दूसरी ओर उनकी बेटी पल्लवी पटेल ने अलग राजनीतिक राह चुनी और सामाजिक न्याय की राजनीति को आगे बढ़ाया।
आज भाजपा की सामाजिक इंजीनियरिंग, समाजवादी पार्टी की पीडीए रणनीति और अन्य दलों की पिछड़ा वर्ग केंद्रित राजनीति में गैर-यादव ओबीसी समाज की जो निर्णायक भूमिका दिखाई देती है, उसके पीछे डॉ. सोनेलाल पटेल के लंबे राजनीतिक संघर्ष और वैचारिक योगदान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।


