लखनऊ। उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और आज़ाद समाज पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव खुलकर सामने आता दिख रहा है। मेरठ के चर्चित ललिता गौतम हत्याकांड को लेकर हुए धरना-प्रदर्शन के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने बिना किसी नेता का नाम लिए सड़क जाम, हंगामा, तोड़फोड़ और हिंसक आंदोलनों की कड़ी आलोचना की।
मायावती ने कहा कि विधानसभा चुनाव नज़दीक आते ही विरोधी दल कुछ दलित संगठनों और राजनीतिक दलों को आगे कर बहुजन समाज को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने अपने बयान में “मगरमच्छ के आंसू”, “संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थ” और “दलित संगठनों के कंधे पर बंदूक रखकर राजनीति” जैसे तीखे शब्दों का प्रयोग करते हुए ऐसे आंदोलनों पर सवाल उठाए।
बसपा प्रमुख ने यह भी कहा कि हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान दर्ज होने वाले मुकदमे और जेल जाने की स्थिति युवाओं के भविष्य के साथ-साथ उनके परिवारों के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर सकती है। उन्होंने बहुजन समाज से भावनाओं के बजाय सोच-समझकर निर्णय लेने और शांतिपूर्ण एवं संवैधानिक तरीके से संघर्ष करने की अपील की।
हालांकि मायावती ने अपने बयान में किसी नेता का नाम नहीं लिया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे आज़ाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आज़ाद पर सीधा राजनीतिक हमला माना जा रहा है।
मायावती के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए चंद्रशेखर आज़ाद ने कहा कि बसपा प्रमुख के शब्दों से उन्हें व्यक्तिगत रूप से ठेस पहुंची है। उन्होंने संकेत दिया कि बहुजन समाज के हितों के लिए संघर्ष जारी रहेगा और जनता ही तय करेगी कि कौन उनके अधिकारों की वास्तविक लड़ाई लड़ रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बयान और पलटवार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मिशन 2027 से पहले उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में बसपा और आज़ाद समाज पार्टी के बीच नेतृत्व और जनाधार को लेकर सीधी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। आने वाले समय में यह मुकाबला प्रदेश की चुनावी राजनीति का एक अहम केंद्र बन सकता है।


