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Thursday, April 16, 2026

चकबंदी की जकड़ में फंसे किसान, 32 साल से अधर में व्यवस्था

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– एक हजार किसान सरकारी गेहूं खरीद से बाहर
फर्रुखाबाद। प्रशासनिक लापरवाही और दशकों से लटकी चकबंदी प्रक्रिया अब सीधे किसानों की आजीविका पर चोट कर रही है। तहसील सदर के बढ़पुर ब्लॉक के कई गांवों में करीब एक हजार किसान सरकारी गेहूं खरीद से वंचित हो गए हैं, क्योंकि उनका पंजीकरण ही नहीं हो पा रहा। मामला सामने आने के बाद आलू विकास विपणन सहकारी संघ के निदेशक अशोक कटियार ने जिलाधिकारी को पत्र लिखकर तत्काल समाधान की मांग की है।
कटरी गंगपुर, छोटी गुलरिया, बड़ी गुलरिया और पहाड़पुर जैसे गांव पिछले 32 वर्षों से चकबंदी सर्वे बंदोबस्त की प्रक्रिया में उलझे हुए हैं। स्थिति यह है कि इतने लंबे समय बाद भी राजस्व अभिलेखों में किसानों की भूमि का स्पष्ट विवरण दर्ज नहीं हो सका है। नतीजतन किसान सरकारी खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचने के लिए जरूरी पंजीकरण नहीं करा पा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक प्रभावित गांवों में करीब 900 से 1000 किसान इस समस्या से जूझ रहे हैं। मौजूदा समय में जब सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर गेहूं खरीद को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं फर्रुखाबाद के ये किसान बाजार में औने-पौने दाम पर फसल बेचने को मजबूर हैं। यह सीधे तौर पर किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है।
छोटी गुलरिया के किसान बाबूराम सहित कई किसानों ने तहसील दिवस में शिकायत दर्ज कराई थी। लेकिन प्रशासनिक फाइलों में शिकायतें दबकर रह गईं और जमीन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर तहसील दिवस जैसी व्यवस्थाएं सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई हैं या फिर किसानों की समस्याओं के समाधान का कोई वास्तविक तंत्र भी मौजूद है।
अशोक कटियार ने अपने पत्र में साफ तौर पर कहा है कि जब तक राजस्व अभिलेख अपडेट नहीं होंगे, तब तक किसान हर सरकारी योजना से वंचित रहेंगे। उन्होंने मांग की है कि शासन की नीति के अनुरूप सभी प्रभावित किसानों का तत्काल पंजीकरण कराया जाए और चकबंदी प्रक्रिया को समयबद्ध तरीके से पूरा किया जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि चकबंदी प्रक्रिया का इतने लंबे समय तक लंबित रहना प्रशासनिक विफलता का बड़ा उदाहरण है। जहां एक ओर सरकार डिजिटल इंडिया और पारदर्शी व्यवस्था की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीन से जुड़े मूल रिकॉर्ड तक अपडेट नहीं हैं।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जिला प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को प्राथमिकता देकर हजारों किसानों को राहत देगा या फिर यह मामला भी कागजों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल फर्रुखाबाद के किसान अपनी मेहनत की फसल का उचित मूल्य पाने के लिए सिस्टम से लड़ाई लड़ रहे हैं।

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