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Wednesday, June 24, 2026

इतिहास खामोश लोगों का नहीं, सवाल उठाने वालों का लिखा जाता है

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प्रशांत कटियार
समाज हो, राजनीति हो या फिर किसी व्यवस्था का संचालन, हर दौर में एक बात समान रही है सच कभी भीड़ का मोहताज नहीं होता। सच अक्सर अकेला खड़ा होता है, लेकिन समय बीतने के बाद वही सच इतिहास का आधार बनता है। इतिहास के पन्ने पलटकर देखिए, आपको वे लोग याद मिलेंगे जिन्होंने अन्याय, भ्रष्टाचार, भेदभाव और गलत नीतियों पर सवाल उठाने का साहस किया। खामोश रहकर सब कुछ स्वीकार करने वालों का नाम शायद ही कहीं दर्ज मिलता है।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि नागरिक प्रश्न पूछ सके। जब जनता सवाल पूछना छोड़ देती है, तब जवाबदेही भी खत्म होने लगती है। सत्ता किसी की भी हो, विचारधारा कोई भी हो, यदि गलत को गलत कहने का साहस नहीं है तो समाज धीरे-धीरे अंधानुकरण की ओर बढ़ने लगता है। सच का साथ देना किसी दल, व्यक्ति या संगठन के खिलाफ होना नहीं है, बल्कि व्यवस्था को बेहतर बनाने का प्रयास है।

समाज में भी यही सिद्धांत लागू होता है। कई बार लोग रिश्तों, सामाजिक दबावों या व्यक्तिगत स्वार्थों के कारण अन्याय देखकर भी चुप रह जाते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि परिवर्तन हमेशा उन्हीं लोगों ने किया जिन्होंने भीड़ से अलग सोचने और सच बोलने का जोखिम उठाया। चाहे सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आंदोलन हों, स्वतंत्रता संग्राम हो या नागरिक अधिकारों की लड़ाई, हर परिवर्तन की शुरुआत एक सवाल से हुई है।

आज के दौर में सोशल मीडिया और सूचना के बढ़ते साधनों ने हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का मंच दिया है। लेकिन इसके साथ यह जिम्मेदारी भी आती है कि हम तथ्यों के आधार पर अपनी राय बनाएं और सच का साथ दें। केवल इसलिए किसी बात को सही नहीं माना जा सकता क्योंकि उसे बड़ी संख्या में लोग दोहरा रहे हैं। विवेक, तथ्य और नैतिक साहस ही सच्चे नागरिक की पहचान हैं।

सच का साथ देना हमेशा आसान नहीं होता। कभी आलोचना झेलनी पड़ती है, कभी अपनों की नाराजगी और कभी सत्ता की असहजता भी। लेकिन इतिहास का फैसला तत्काल नहीं होता। समय बीतने के बाद वही लोग सम्मान पाते हैं जिन्होंने परिस्थितियों के दबाव में अपने सिद्धांत नहीं छोड़े।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम खामोशी की सुविधा नहीं, बल्कि सच की जिम्मेदारी चुनें। क्योंकि इतिहास उन लोगों को याद रखता है जिन्होंने सवाल पूछे, सच का साथ दिया और समाज को बेहतर बनाने के लिए आवाज उठाई। खामोश रहने वाले भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाते हैं, जबकि सच के पक्ष में खड़े होने वाले इतिहास का हिस्सा बन जाते हैं।

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