– आज बढ़ रहे गाँव गाँव, गली गली कैंसर रोगी
आज जब कोई व्यक्ति बाजार से पानी की बोतल खरीदता है तो उसे लगता है कि वह शुद्ध और सुरक्षित पानी पी रहा है। लेकिन विज्ञान की नई खोजों ने इस भरोसे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिकों की रिपोर्ट बता रही हैं कि हम केवल पानी नहीं पी रहे, बल्कि उसके साथ लाखों सूक्ष्म प्लास्टिक कण भी अपने शरीर में पहुंचा रहे हैं। यही माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक अब मानव स्वास्थ्य के लिए नई चुनौती बनकर उभर रहे हैं।
वर्ष 2024 में प्रकाशित एक चर्चित अध्ययन में पाया गया कि एक लीटर बोतलबंद पानी में औसतन लगभग 2.4 लाख (240,000) प्लास्टिक कण मौजूद हो सकते हैं। इनमें लगभग 90 प्रतिशत नैनोप्लास्टिक थे, जो इतने सूक्ष्म हैं कि रक्त प्रवाह और शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंच सकते हैं। यह संख्या पहले के अनुमानों से 10 से 100 गुना अधिक पाई गई।
चिंता की बात यह है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल पानी तक सीमित नहीं हैं। वैज्ञानिक इन्हें समुद्री भोजन, नमक, शहद, दूध, फलों, सब्जियों और यहां तक कि मानव रक्त तथा शरीर के अन्य ऊतकों में भी खोज चुके हैं। प्लास्टिक का बढ़ता उपयोग और उसका पर्यावरण में विघटन इस समस्या को लगातार बढ़ा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में सूजन, कोशिकीय क्षति और हार्मोनल असंतुलन जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं। कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह आशंका भी जताई गई है कि लंबे समय तक इन कणों के संपर्क में रहने से कैंसर, प्रजनन संबंधी विकार, तंत्रिका तंत्र की समस्याएं और हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि मनुष्यों पर अंतिम और निर्णायक निष्कर्षों के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।
भारत में कैंसर का बोझ भी तेजी से बढ़ रहा है। सरकारी और चिकित्सा संस्थानों के अनुमान बताते हैं कि देश में हर वर्ष लगभग 14 से 15 लाख नए कैंसर मरीज सामने आ रहे हैं और आने वाले वर्षों में यह संख्या और बढ़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रदूषण, रासायनिक पदार्थों का बढ़ता संपर्क, अस्वास्थ्यकर जीवनशैली और पर्यावरणीय विषैले तत्व इस वृद्धि के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। माइक्रोप्लास्टिक को भी अब संभावित जोखिम कारकों में गिना जाने लगा है, हालांकि इसके प्रत्यक्ष प्रभावों पर अभी व्यापक शोध जारी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस खतरे से बचा जा सकता है? वैज्ञानिक सलाह देते हैं कि एकल उपयोग वाली प्लास्टिक बोतलों का प्रयोग कम किया जाए, स्टील या कांच की बोतलों को प्राथमिकता दी जाए, प्लास्टिक के बर्तनों में गर्म भोजन न रखा जाए और प्लास्टिक कचरे के उपयोग तथा निस्तारण को लेकर अधिक जिम्मेदार रवैया अपनाया जाए।
माइक्रोप्लास्टिक का संकट केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण, उद्योग और हमारी जीवनशैली से जुड़ा हुआ प्रश्न है। जिस तरह कभी धूम्रपान और एस्बेस्टस के खतरों को समझने में दशकों लग गए थे, उसी तरह माइक्रोप्लास्टिक के प्रभावों को लेकर भी दुनिया अभी शोध के शुरुआती दौर में है। लेकिन उपलब्ध संकेत इतने गंभीर हैं कि उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यदि समय रहते प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां शायद स्वच्छ पानी नहीं, बल्कि प्लास्टिक घुला हुआ भविष्य पीने को मजबूर होंगी।


