भरत चतुर्वेदी
आज का दौर शोर का दौर है। हर व्यक्ति अपनी बात सबसे पहले और सबसे ज्यादा कह देना चाहता है। मोबाइल स्क्रीन से लेकर राजनीतिक मंचों तक, बहसों से लेकर पारिवारिक रिश्तों तक हर जगह शब्दों की बाढ़ दिखाई देती है। लेकिन इसी भीड़ में सबसे प्रभावशाली वही व्यक्ति होता है, जो कम बोलता है, सोचकर बोलता है और उतना ही बोलता है जितना अत्यंत आवश्यक हो।
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्तियों में एक उसकी वाणी है। यही वाणी रिश्ते बनाती है, यही तोड़ती भी है। कई बार जीवन की बड़ी समस्याएं किसी बड़े अपराध से नहीं, बल्कि बिना सोचे बोले गए छोटे-छोटे शब्दों से जन्म लेती हैं। एक कटु वाक्य वर्षों की मित्रता समाप्त कर देता है, एक गलत टिप्पणी परिवारों में दूरी पैदा कर देती है और एक असंयमित बयान समाज में विवाद खड़ा कर देता है।
वास्तविक बुद्धिमत्ता अधिक बोलने में नहीं, बल्कि सही समय पर सही शब्द चुनने में होती है। जिस बात के बिना काम चल सकता हो, उसे कहने की आवश्यकता ही क्या है? अधिकांश विवाद इसलिए पैदा होते हैं क्योंकि लोग अपनी हर प्रतिक्रिया तुरंत व्यक्त करना चाहते हैं। जबकि हर बात पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं होता।
यदि मनुष्य एक दिन अपने बोले गए शब्दों का ईमानदारी से मूल्यांकन करे, तो उसे महसूस होगा कि उसने जो कुछ कहा, उसमें से बहुत बड़ा हिस्सा अनावश्यक था। कई बातें ऐसी थीं जिन्हें न कहा जाता तो कोई नुकसान नहीं होता, बल्कि कह देने से संबंध खराब हुए, तनाव बढ़ा और मन अशांत हुआ।
कम बोलना कमजोरी नहीं है। यह आत्मनियंत्रण की सबसे ऊंची अवस्था है। मौन व्यक्ति अक्सर ज्यादा समझदार माना जाता है क्योंकि वह सुनना जानता है। सुनना एक दुर्लभ कला है और जो सुनना सीख जाता है, वह जीवन को बेहतर ढंग से समझने लगता है।
भारतीय परंपरा में भी वाणी संयम को तपस्या माना गया है। संतों और महापुरुषों ने हमेशा शब्दों की मर्यादा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा बोलो जिससे किसी का मन न दुखे और यदि बोलना आवश्यक न हो तो मौन सबसे श्रेष्ठ है।
आज सोशल मीडिया के समय में यह शिक्षा और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। लोग बिना तथ्य जाने, बिना परिणाम सोचे प्रतिक्रिया दे देते हैं। बाद में वही शब्द पछतावे का कारण बनते हैं। इसलिए आवश्यक है कि बोलने से पहले मनुष्य स्वयं से एक प्रश्न पूछे क्या यह कहना जरूरी है? यदि उत्तर “नहीं” हो, तो मौन ही बेहतर विकल्प है।
जीवन में शांति चाहिए तो शब्दों को सीमित करना सीखना होगा। क्योंकि कई बार मनुष्य अपने कर्मों से कम और अपनी वाणी से अधिक संकट में पड़ता है। कम शब्द, स्पष्ट विचार और शांत व्यवहार यही परिपक्व व्यक्तित्व की पहचान है।


