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Monday, May 25, 2026

परिणाम अंक का सूचक है, क्षमता और कौशल का नहीं

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डॉ विजय गर्ग
आज के समय में परीक्षा परिणाम को ही विद्यार्थियों की योग्यता का सबसे बड़ा मापदंड मान लिया गया है। जिस छात्र के अधिक अंक आते हैं, उसे होनहार और सफल माना जाता है, जबकि कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को अक्सर कमजोर समझ लिया जाता है। लेकिन वास्तव में परीक्षा परिणाम केवल अंकों का सूचक होता है, किसी व्यक्ति की वास्तविक क्षमता, प्रतिभा और कौशल का नहीं।

हर विद्यार्थी की सोच, रुचि और योग्यता अलग-अलग होती है। कोई गणित में अच्छा होता है, कोई विज्ञान में, तो कोई खेल, संगीत, चित्रकला, लेखन या तकनीकी कार्यों में अपनी विशेष प्रतिभा रखता है। परीक्षा प्रणाली मुख्य रूप से याददाश्त और कुछ घंटों के प्रदर्शन को मापती है। यह किसी छात्र की रचनात्मकता, नेतृत्व क्षमता, व्यवहारिक ज्ञान, आत्मविश्वास, समस्या समाधान की योग्यता और जीवन कौशल को पूरी तरह नहीं आंक सकती।

इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ सामान्य अंक प्राप्त करने वाले लोगों ने जीवन में असाधारण सफलता हासिल की। कई महान वैज्ञानिक, उद्योगपति, खिलाड़ी और कलाकार विद्यालयी परीक्षाओं में टॉपर नहीं थे, फिर भी उन्होंने अपने कौशल, मेहनत और लगन के बल पर दुनिया में पहचान बनाई। इससे स्पष्ट होता है कि सफलता केवल अंकों पर निर्भर नहीं करती।

दुर्भाग्य की बात यह है कि आज विद्यार्थियों पर अच्छे अंक लाने का अत्यधिक दबाव बनाया जाता है। माता-पिता, रिश्तेदार और समाज कई बार बच्चों की तुलना दूसरों से करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि अनेक विद्यार्थी तनाव, चिंता और हीन भावना का शिकार हो जाते हैं। कुछ बच्चे तो अपनी वास्तविक प्रतिभा को पहचान ही नहीं पाते क्योंकि वे केवल अंकों की दौड़ में उलझे रहते हैं।

शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान और जिम्मेदार नागरिक बनाना है। विद्यालयों को चाहिए कि वे बच्चों के कौशल और रुचियों को पहचानें तथा उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दें। खेल, कला, तकनीकी शिक्षा, संचार कौशल और व्यावहारिक ज्ञान को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना अकादमिक विषयों को दिया जाता है।

आज का युग कौशल आधारित युग है। डिजिटल दुनिया में वही व्यक्ति आगे बढ़ता है जिसके पास नई सोच, रचनात्मकता, सीखने की इच्छा और व्यावहारिक क्षमता होती है। कंपनियाँ और संस्थाएँ भी अब केवल डिग्री या अंकों को नहीं, बल्कि व्यक्ति के कौशल और कार्य क्षमता को अधिक महत्व देने लगी हैं।

इसलिए विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि परीक्षा परिणाम जीवन का अंतिम सत्य नहीं है। अधिक अंक सफलता की गारंटी नहीं होते और कम अंक असफलता का प्रमाण नहीं होते। जीवन में निरंतर सीखना, मेहनत करना, अनुशासन बनाए रखना और अपने कौशल को विकसित करना ही वास्तविक सफलता का मार्ग है।

अंततः यह कहना उचित होगा कि अंक केवल कागज पर लिखे हुए नंबर हैं, जबकि वास्तविक क्षमता और कौशल व्यक्ति के व्यवहार, सोच, मेहनत और प्रतिभा में छिपे होते हैं। समाज को चाहिए कि वह बच्चों का मूल्यांकन केवल अंकों से नहीं, बल्कि उनकी संपूर्ण योग्यता और संभावनाओं के आधार पर करे।
डॉ विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब

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