भरत चतुर्वेदी
देश में महंगाई एक बार फिर चिंता का विषय बन गई है। जून 2026 में खुदरा महंगाई बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर है। यह पिछले 17 महीनों में पहली बार है जब महंगाई केंद्रीय बैंक के लक्ष्य से आगे निकली है। खाद्य पदार्थों और ईंधन की बढ़ती कीमतें, मानसून की अनिश्चितता तथा पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने महंगाई के दबाव को बढ़ा दिया है।
महंगाई का सबसे अधिक असर आम परिवारों की रसोई पर दिखाई दे रहा है। सब्जियां, दालें, दूध, खाद्य तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसके साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों का प्रभाव परिवहन लागत पर पड़ता है, जिससे लगभग हर वस्तु महंगी हो जाती है। बाजार में बढ़ी लागत का बोझ आखिरकार उपभोक्ताओं की जेब पर ही आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बार महंगाई केवल घरेलू कारणों से नहीं बढ़ी है। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका बनी हुई है। दूसरी ओर, कई राज्यों में मानसून की असमान बारिश से कृषि उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ी है। यदि आने वाले महीनों में वर्षा सामान्य नहीं रही तो खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य महंगाई और तेज हो सकती है।
महंगाई बढ़ने का सीधा असर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर भी पड़ सकता है। यदि कीमतों में तेजी लगातार बनी रहती है तो आने वाले महीनों में ब्याज दरें बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। ब्याज दर बढ़ने का अर्थ है कि घर, वाहन और व्यक्तिगत ऋण महंगे हो सकते हैं तथा EMI का बोझ बढ़ सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय आर्थिक परिस्थितियों और आगामी आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग के लिए यह स्थिति सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण है। एक ओर आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो रही, वहीं दूसरी ओर रोजमर्रा का खर्च लगातार बढ़ रहा है। रसोई का बजट बिगड़ रहा है, बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन पर खर्च बढ़ रहा है। ऐसे में परिवारों को अपनी बचत और खर्च के बीच नया संतुलन बनाना पड़ रहा है।
व्यापार और उद्योग भी इससे अछूते नहीं हैं। कच्चे माल और परिवहन की लागत बढ़ने से उत्पादन महंगा हो रहा है। छोटे और मध्यम उद्योगों पर इसका अधिक दबाव पड़ता है, क्योंकि वे बढ़ी हुई लागत को पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पाते। इससे उनके लाभ पर असर पड़ सकता है और नए निवेश की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है।
कृषि क्षेत्र के लिए आने वाले कुछ महीने बेहद महत्वपूर्ण होंगे। यदि मानसून सामान्य रहता है और फसल अच्छी होती है तो खाद्य पदार्थों की कीमतों में राहत मिल सकती है। लेकिन यदि बारिश कमजोर रही या प्राकृतिक आपदाएं बढ़ीं तो महंगाई का दबाव और बढ़ सकता है। इसलिए सरकार के लिए खाद्यान्न आपूर्ति, भंडारण और वितरण व्यवस्था को मजबूत रखना आवश्यक होगा।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। एक ओर आम जनता को राहत देना और दूसरी ओर आर्थिक विकास की गति बनाए रखना। यदि ईंधन की कीमतों पर नियंत्रण, आवश्यक वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत रखने जैसे कदम प्रभावी ढंग से उठाए जाते हैं, तो महंगाई पर कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है।
महंगाई केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि हर परिवार के दैनिक जीवन से जुड़ा मुद्दा है। जब आवश्यक वस्तुएं महंगी होती हैं तो उसका असर सीधे रसोई, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और भविष्य की बचत पर पड़ता है। आने वाले महीनों में सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक और मौसम तीनों की भूमिका यह तय करेगी कि महंगाई पर लगाम लगती है या आम आदमी का बजट और अधिक दबाव में आता है।
महंगाई की नई मार: क्या बढ़ती कीमतें आम आदमी का बजट बिगाड़ देंगी?


