राज
भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दोनों देशों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक अंतिम सहमति नहीं बन सकी है। हालांकि दोनों पक्ष बातचीत जारी रखने और एक संतुलित समझौते की दिशा में आगे बढ़ने की बात कह रहे हैं, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर मतभेद अब भी बरकरार हैं।
भारत और अमेरिका दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है और लक्ष्य आने वाले वर्षों में इसे कई गुना बढ़ाना है। ऐसे में यह व्यापार समझौता केवल दो देशों के आर्थिक संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक व्यापार और निवेश के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
समझौता इसलिए अटका है क्योंकि भारत चाहता है कि भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में बेहतर टैरिफ (आयात शुल्क) का लाभ मिले। साथ ही भारत यह भी चाहता है कि समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में अचानक नए शुल्क न लगाए। दूसरी ओर अमेरिका अपने उत्पादों, विशेषकर कृषि, डेयरी और अन्य क्षेत्रों के लिए भारतीय बाजार में अधिक पहुंच चाहता है। इन मुद्दों पर दोनों देशों के बीच अभी सहमति नहीं बन पाई है।
भारत का सबसे बड़ा आग्रह कृषि क्षेत्र को लेकर है। देश का मानना है कि यदि कृषि बाजार को बिना पर्याप्त सुरक्षा के पूरी तरह खोल दिया गया तो करोड़ों छोटे किसानों पर दबाव बढ़ सकता है। इसी कारण भारत इस क्षेत्र में जल्दबाजी में कोई समझौता नहीं करना चाहता। सरकार का प्रयास है कि किसानों के हितों से समझौता किए बिना व्यापारिक अवसरों का विस्तार किया जाए।
यदि यह समझौता सफल होता है तो भारतीय उद्योगों को बड़ा लाभ मिल सकता है। वस्त्र उद्योग, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटो पार्ट्स, आईटी सेवाएं, रत्न एवं आभूषण तथा कई अन्य निर्यात क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी अवसर मिल सकते हैं। इससे निर्यात बढ़ेगा, विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि होगी और रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।
भारतीय स्टार्टअप और विनिर्माण क्षेत्र को भी इस समझौते से लाभ मिलने की उम्मीद है। यदि व्यापारिक बाधाएं कम होती हैं तो विदेशी निवेश बढ़ सकता है, नई तकनीक भारत आ सकती है और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई गति मिल सकती है। इससे वैश्विक कंपनियां भारत को उत्पादन केंद्र के रूप में और अधिक महत्व दे सकती हैं।
हालांकि समझौते का दूसरा पक्ष भी है। यदि अमेरिकी उत्पादों को भारतीय बाजार में अधिक छूट मिलती है तो कुछ घरेलू उद्योगों और छोटे कारोबारियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए भारत ऐसा संतुलित समझौता चाहता है जिसमें उद्योग, किसान और उपभोक्ता तीनों के हित सुरक्षित रहें।
हाल के वर्षों में भारत ने ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत किए हैं और अन्य साझेदारों के साथ भी समझौते आगे बढ़ाए हैं। इससे भारत की वैश्विक व्यापारिक स्थिति पहले की तुलना में अधिक मजबूत हुई है। यही कारण है कि भारत किसी भी समझौते को जल्दबाजी में अंतिम रूप देने के बजाय अपने दीर्घकालिक आर्थिक हितों को प्राथमिकता दे रहा है।
व्यापार सचिव राजेश अग्रवाल ने हाल में कहा कि भारत और अमेरिका के बीच वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और समझौते के लिए एक रूपरेखा तैयार है। हालांकि अंतिम हस्ताक्षर उचित समय पर ही होंगे। वहीं केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने उन खबरों का खंडन किया है जिनमें कहा गया था कि भारत जानबूझकर समझौते में देरी कर रहा है।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता केवल आयात-निर्यात का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक रणनीति, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और भविष्य की विकास यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण कदम है। यदि दोनों देश संतुलित और पारस्परिक हितों वाला समझौता करने में सफल होते हैं तो इसका लाभ उद्योग, व्यापार, निवेश, रोजगार और अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों तक पहुंच सकता है। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि विकास की इस दौड़ में किसानों, छोटे उद्योगों और घरेलू बाजार के हितों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता बनी रहे।


