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Thursday, October 8, 2026

प्रदूषण से पीड़ित है श्वास, अस्थमा पर समाज की जिम्मेदारी

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सांसें……जीवन की सबसे स्वाभाविक प्रक्रिया, जिसे हम तब तक महसूस नहीं करते जब तक वह कठिन न हो जाए। विश्व अस्थमा दिवस हमें इसी मूलभूत अधिकार स्वच्छ और सहज श्वास की अहमियत का एहसास कराता है। आधुनिक जीवनशैली, बढ़ता वायु प्रदूषण और बदलते पर्यावरणीय हालात ने अस्थमा को एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती बना दिया है।

अस्थमा केवल एक रोग नहीं, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जो व्यक्ति के दैनिक जीवन, उसकी कार्यक्षमता और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालती है। धूल, धुआं, परागकण, ठंडी हवा और रसायनों का बढ़ता संपर्क इस बीमारी को और जटिल बना देता है। शहरों में फैलता प्रदूषण और गांवों में पारंपरिक ईंधनों का उपयोग दोनों ही इस समस्या को बढ़ावा देते हैं। जरूरत केवल उपचार की नहीं, बल्कि जागरूकता और रोकथाम की है। समय पर पहचान, नियमित दवा, संतुलित जीवनशैली और स्वच्छ वातावरण ये चार स्तंभ अस्थमा नियंत्रण के आधार हैं। लेकिन यह तभी संभव है, जब समाज और शासन मिलकर वायु गुणवत्ता सुधारने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।

हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण संरक्षण को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाए। यह भी समझना जरूरी है कि अस्थमा से ग्रसित व्यक्ति किसी दया का पात्र नहीं, बल्कि संवेदनशील सहयोग का अधिकारी है। उन्हें सामान्य जीवन जीने का अवसर और आत्मविश्वास देना समाज का दायित्व है। स्कूलों, कार्यस्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे वातावरण का निर्माण किया जाना चाहिए, जहां वे बिना भय के सांस ले सकें। विश्व अस्थमा दिवस केवल एक जागरूकता अभियान नहीं, बल्कि एक सामूहिक संकल्प है ऐसे भविष्य के निर्माण का, जहां हर व्यक्ति खुलकर, बिना किसी बाधा के सांस ले सके।

 

सांसों में घुला धुआं, जीवन को बांधता है,

हर श्वास में छिपा संघर्ष, मन को साधता है।

स्वच्छ हवा का हक मिले, यही हमारी आस,

हर दिल में बस एक पुकार मुक्त हो हर सांस।।

 

– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”, एवीके न्यूज सर्विस

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