
शरद कटियार
नई दिल्ली/चेन्नई। भारतीय राजनीति के इतिहास में वर्ष 1991 एक ऐसा अध्याय है, जिसे आज भी संघीय ढांचे और संवैधानिक शक्तियों के टकराव के रूप में याद किया जाता है। उस समय देश के प्रधानमंत्री चंद्र शेखर ने 30 जनवरी 1991 को तमिलनाडु की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया। राज्य में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके ) के नेता एम . करूणानिधि मुख्यमंत्री थे और उनकी सरकार बहुमत में थी।
यह फैसला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत लिया गया, जिसके जरिए किसी राज्य में “संवैधानिक तंत्र विफल” होने की स्थिति में केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन लागू कर सकती है। इस कार्रवाई के बाद 31 जनवरी 1991 से तमिलनाडु में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
केंद्र सरकार ने इस कदम के लिए मुख्य रूप से दो बड़े कारण बताए,पहला, राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ना,
और दूसरा, डीएमके सरकार पर श्रीलंका के उग्रवादी संगठन एलटीटीई से कथित संबंध होने के आरोप।
उस समय श्रीलंका में चल रहे गृहयुद्ध और एलटीटीई की गतिविधियों का असर दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में भी महसूस किया जा रहा था। केंद्र सरकार का मानना था कि राज्य सरकार इस स्थिति को प्रभावी ढंग से नियंत्रित नहीं कर पा रही है।
राज्यपाल की भूमिका और विवाद
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे विवादास्पद पहलू यह रहा कि तमिलनाडु के तत्कालीन राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला ने सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश करने से इनकार कर दिया था। परंपरागत रूप से अनुच्छेद 356 लगाने से पहले राज्यपाल की रिपोर्ट अहम मानी जाती है, लेकिन इस मामले में केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर निर्णय लेते हुए कार्रवाई कर दी।
यही कारण था कि इस फैसले को लेकर देशभर में राजनीतिक बहस छिड़ गई। विपक्षी दलों ने इसे संघीय ढांचे के खिलाफ बताते हुए कहा कि यह राज्यों के अधिकारों में हस्तक्षेप है, जबकि केंद्र सरकार ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक जिम्मेदारी का कदम बताया।
भारत में अनुच्छेद 356 का उपयोग हमेशा विवादों के घेरे में रहा है। कई बार इसे राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किए जाने के आरोप लगे हैं। 1991 का तमिलनाडु मामला भी इसी बहस का बड़ा उदाहरण बना, जहां सवाल उठा कि क्या वास्तव में संवैधानिक तंत्र विफल हुआ था या यह एक राजनीतिक निर्णय था।
बाद के वर्षों में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस विषय पर कई महत्वपूर्ण फैसले दिए, जिनमें कहा गया कि अनुच्छेद 356 का इस्तेमाल सीमित और न्यायिक समीक्षा के दायरे में होना चाहिए।
1991 की यह घटना केवल एक राज्य सरकार की बर्खास्तगी नहीं थी, बल्कि इसने केंद्र-राज्य संबंधों की सीमाओं को लेकर नई बहस को जन्म दिया। यह मामला आज भी प्रशासनिक और संवैधानिक अध्ययन में एक महत्वपूर्ण केस के रूप में पढ़ाया जाता है।
“यादों के झरोखे” से देखें तो यह घटना बताती है कि भारतीय लोकतंत्र में शक्ति संतुलन कितना नाजुक और महत्वपूर्ण है। एक ओर केंद्र की जिम्मेदारी होती है राष्ट्रीय सुरक्षा और संवैधानिक व्यवस्था बनाए रखना, तो दूसरी ओर राज्यों की स्वायत्तता भी उतनी ही जरूरी है,1991 का यह फैसला इसी संतुलन की परीक्षा था जिसकी गूंज आज भी भारतीय राजनीति में सुनाई देती है।


