उत्तर प्रदेश के राजस्व तंत्र में एक ऐसा खेल सामने आ रहा है, जिसने प्रशासनिक ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि जिन लेखपालों पर जमीन के रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी है, वही अब सरकारी अभिलेखों में हेरफेर कर कब्जों के बड़े नेटवर्क को अंजाम दे रहे हैं। गांवों से लेकर कस्बों तक “खतौनी-खसरा” में बदलाव कर सरकारी जमीन को निजी बताकर कब्जे कराए जा रहे हैं।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह खेल अब व्यक्तिगत नहीं बल्कि संगठित रूप ले चुका है। सूत्रों के अनुसार, कई जगहों पर लेखपाल, कानूनगो और स्थानीय दलालों की मिलीभगत से जमीन के कागजों में बदलाव कर दिए जाते हैं। “सरकारी बंजर” या “चारागाह” जैसी जमीन को रिकॉर्ड में निजी नामों में चढ़ा दिया जाता है। इसके बाद मोटी रकम लेकर उस जमीन पर कब्जा करा दिया जाता है।
राजस्व विभाग के अंदरूनी आंकड़ों के अनुसार, बीते कुछ वर्षों में जमीन विवादों से जुड़े मामलों में 30% तक बढ़ोतरी हुई है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे मामलों की है, जहां रिकॉर्ड में अचानक बदलाव पाया गया। कई मामलों में जांच के दौरान यह सामने आया कि बिना किसी वैध आदेश के नामांतरण (म्यूटेशन) कर दिए गए।
ग्रामीण इलाकों में हालात और गंभीर हैं। गरीब और कमजोर वर्ग के लोग जब अपनी जमीन के कागज निकलवाने जाते हैं, तो उन्हें पता चलता है कि रिकॉर्ड में उनका नाम ही गायब है या किसी और के नाम दर्ज हो चुका है। शिकायत करने पर महीनों तक चक्कर काटने पड़ते हैं, जबकि दूसरी तरफ कब्जाधारी बेखौफ निर्माण कर लेते हैं।
राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं। डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम लागू होने के बावजूद “मैनुअल एंट्री” और लोकल स्तर पर छेड़छाड़ की गुंजाइश बनी हुई है। कई जिलों में शिकायतें आने के बाद भी कार्रवाई धीमी है, जिससे लेखपालों के हौसले बुलंद हैं।
राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे की गूंज सुनाई दे रही है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर आरोप है कि वे ऐसे मामलों में दबाव बनाकर कार्रवाई को प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि कई बड़े घोटाले सामने आने के बाद भी दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती।
यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं, बल्कि सिस्टम में घुस चुके उस “भ्रष्ट नेटवर्क” का संकेत है, जो गरीब की जमीन छीनकर मुनाफा कमा रहा है। अगर समय रहते इस पर लगाम नहीं लगी, तो आने वाले समय में यह विवाद कानून-व्यवस्था के लिए भी बड़ा खतरा बन सकता है।सरकार के लिए यह परीक्षा की घड़ी है क्या वह अपने ही तंत्र में बैठे ‘भूमाफियाओं’ पर कार्रवाई करेगी या यह खेल यूं ही चलता रहेगा?


