प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि वयस्कों के बीच सहमति से बने और लंबे समय तक चलने वाले शारीरिक संबंध बलात्कार नहीं (not rape) हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने बलात्कार के एक मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका मंजूर कर ली। न्यायालय ने आरोपी को सशर्त अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि वह जांच में पुलिस का सहयोग करेगा।
यह आदेश मंगलवार को न्यायमूर्ति राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने पारित किया। आजमगढ़ के सिधारी पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज होने के बाद गिरफ्तारी से बचने के लिए आरोपी ने उच्च न्यायालय में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता को इस मामले में झूठा फंसाया गया है।
पीड़िता का एक 15 वर्षीय बेटा है और वह विधवा है, उसने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(4) के तहत आवेदन देकर याचिकाकर्ता के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। सभी तथ्यों के आधार पर, अदालत ने फैसला सुनाया कि वयस्कों के बीच लंबे समय तक चलने वाले, सहमति से बने शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान याची के वकील ने कोर्ट ने दलील देते हुए कहा कि याची को बलात्कार केस में फर्जी तरीके से फंसाया गया है। उन्होंने कोर्ट में अपनी सारी दलीलें रखीं। कोर्ट ने सभी तथ्यों के आधार पर माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे फिजिकल रिलेशन को बलात्कार नहीं माना जा सकता है।
पीड़ित जो एक विधवा है और उसका 15 साल का बेटा है उसने BNSS की धारा 173(4) के तहत एक अर्जी के आधार पर याची के खिलाफ झूठी रिपोर्ट दर्ज कराई है। BNS की धारा 183 के तहत दर्ज किया गया बयान FIR में बताई गई कहानी से बिल्कुल अलग है। धारा 183 के तहत दर्ज बयान में आपसी सहमति से संबंध दिखाया गया है और याचिकाकर्ता के खिलाफ BNS की धारा 64(1) के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। वहीं याची का कोई क्रिमिनल इतिहास नहीं है।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि मामले में महिला ने दावा किया कि उसने 2022 से याचिकाकर्ता से बात करना शुरू किया था। हालांकि कोर्ट में सरकार की तरफ से अग्रिम जमानत याचिका का विरोध किया गया, कहा गया कि याची इस मामले में अकेला नामजद आरोपी है। उसने पीड़िता का फायदा उठाते हुए बंदूक की नोक पर उसके साथ रेप किया। सभी पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि FIR में यह नहीं बताया गया कि पीड़िता और याचिकाकर्ता के बीच सहमति से रिश्ता था।
BNSS 183 के तहत दर्ज बयान में पीड़िता का दावा है कि उसने साल 2022 से याची से फोन पर बात करना शुरू कर दिया था और उसके साथ शारीरिक संबंध भी बनाए थे। वह लगभग 35 साल की विधवा है जिसका एक 15 साल का बेटा है। सभी तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय से चले आ रहे फिजिकल रिलेशन को रेप नहीं कहा जा सकता।


