– रंग, अबीर और ‘लोकतंत्र’ 125 यूट्यूबर, गिफ्ट की गिनती और एक खबर की गर्मी
फर्रुखाबाद। होली का मौसम है, रंगों का त्यौहार है, और राजनीति में रंग थोड़े गाढ़े हो जाएं तो उसे भी “त्योहार का उत्साह” मान लिया जाता है। ठंडी सड़क स्थित सांसद मुकेश राजपूत के निवास पर आयोजित प्रेस वार्ता भी कुछ ऐसे ही रंगों में रंग गई — फर्क बस इतना था कि यहां गुलाल कम और ग़लतफ़हमियां ज्यादा उड़ रही थीं।
कहानी कुछ यूं है कि प्रेस वार्ता में स्थानीय पत्रकारों को बुलाया गया था। कुछ पत्रकार थोड़ी देर से पहुंचे, अब होली का ट्रैफिक हो, या खबरों का दबाव, देरी कभी भी हो सकती है। आरोप है कि मौके पर मौजूद एक कार्यकर्ता ने देर से पहुंचे पत्रकारों से “रंगीन” शब्दों में बात कर दी।
करीब 125 यूट्यूबर और लोकतंत्र का लाइव प्रसारण
बताया जा रहा है कि कार्यक्रम में पत्रकारों के अलावा लगभग 125 यूट्यूबर भी धीरे धीरे पहुंच रहे थे। कैमरे ऑन थे, माइक्रोफोन सज चुके थे, और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी-अपनी एंगल सेट कर रहा था। तभी माहौल में हल्की “गरमी” आ गई।
कुछ पत्रकारों का कहना है कि एक कलमकार के साथ अभद्र व्यवहार हुआ, वे वही लोग हैं जो भ्रष्टाचार पर खुलकर खबरें लिखते हैं। अब सवाल ये उठ रहा है — क्या यह संयोग था या रंगों में घुला हुआ संदेश?
होली गिफ्ट और खबर का तापमान
इधर शहर में यह भी चर्चा गर्म है कि “होली गिफ्ट” न मिलने से कुछ लोग नाराज हो गए। अब यह नाराजगी खबर में बदल गई या खबर से नाराजगी पैदा हुई — यह तो राजनीतिक रंगों का विज्ञान ही समझ सकता है।
होली पर लोग कहते हैं — “बुरा न मानो होली है।”


