20.1 C
Lucknow
Wednesday, February 25, 2026

घोषणाओं का जनपद या विकास का इंतज़ार?

Must read

– वादों की बरसात में भीगता फर्रुखाबाद, ज़मीनी हकीकत अब भी सूखी

फर्रुखाबाद: उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार की घोषणाओं का अगर कोई स्थायी पता पूछा जाए, तो वह शायद फर्रुखाबाद ही होगा। यहां वर्षों से घोषणाएं होती रही हैं—कभी 100 करोड़ की स्वीकृति, कभी 1000 करोड़ की योजना, कवि संकिसा के सर्वांगीण विकास का वादा, तो कभी जर्जर पुलों को नए सिरे से बनाने का दावा। हर साल बाढ़ के पानी से डूबते गंगा पार को बचाने के सपने, कागज़ों पर विकास की इबारत लिखी जाती रही, मगर सड़कों पर आज भी गड्ढों का साम्राज्य कायम है।

नगरीय क्षेत्र में हल्की सी बरसात से जल भराव की समस्या बरकरार है ना कोई स्कीम बनी ना कोई निजात की कबायत, आलू उद्योग छपाई उद्योग तो वर्षों से लग रहे हैं सालों से गंगा ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित हो रहा है, पांचाल घाट पर इलेक्ट्रिक शवदाह ग्रह की तो अब मांग ही बंद हो गई, जहानगंज कमालगंज का जर्जर मार्ग, टूटा मंडी रोड टूटी ठंडी सड़क आज भी कायम है, नगरीय क्षेत्रों में दिनभर भयंकर जाम पीछा छोड़ने का नाम नहीं लेता।

प्रदेश में भाजपा शासन के करीब नौ वर्ष पूरे होने को हैं और योगी सरकार का दूसरा कार्यकाल भी बीत रहा है। केंद्र में भी तीसरा कार्यकाल चल ही रहा है। लेकिन जनपद की सड़कों की हालत आज भी वही है, जैसी 10 वर्ष पहले थी—टूटी, गड्ढा युक्त, जलभराव से लबालब। जगह-जगह झूलते बिजली के तार खतरे का संकेत देते रहते हैं।

कभी गुरसहायगंज-फतेहगढ़ मार्ग को फोर लेन बनाने की घोषणा से जनता उत्साहित होती है, तो कभी इटावा-बरेली हाईवे के फोर लेन से टू लेन हो जाने की खबर निराशा दे जाती है। इटावा -बरेली हाईवे बनते-बनते ही अपनी जर्जर शक्ल दिखाने लगा —यहां के लोगों का भरोसा भी उसी तरह दरक गया, जैसे सड़क की परतें।

एशिया की सबसे अधिक राजस्व देने वाली नवीन मंडी सातनपुर की सड़क को डिवाइडर युक्त करने का प्रस्ताव वर्षों से “भेजा गया” बताया जाता है, मगर धरातल पर वही धूल, वही धक्के। नगर का ऐतिहासिक पटेल पार्क सौंदर्यकरण की घोषणाओं से कई बार “संवर” चुका है—कम से कम कागज़ों में। वास्तविकता यह है कि पार्क आज भी बदहाली की तस्वीर बना हुआ है। योगी सरकार का दूसरा कार्यकाल भी समाप्ति की ओर है, लेकिन पार्क की किस्मत अब भी फाइलों में बंद है।

हिंदी की सशक्त हस्ताक्षर महादेवी वर्मा के आवास को संग्रहालय बनाने की घोषणा हो या स्वर्गीय ब्रह्मदत्त द्विवेदी के अधूरे सपनों को साकार करने का वादा—सब कुछ मंचों तक सीमित दिखाई देता है। फर्रुखाबाद का नाम बदलकर पांचाल नगर करने की चर्चा भी समय-समय पर हवा में तैरती रही।

बंद हो चुके छपाई उद्योग को पुनर्जीवित करने की बात हो या जिले में आलू आधारित उद्योग लगाने के वायदे हैं सोशल मीडिया पर आए दिन जिम्मेदारों द्वारा दिखाई ही जाते हैं, गंगा पार हर साल आने वाली बाढ़ से स्थायी समाधान का दावा—जनता आज भी इंतज़ार में है।

चुनावी मौसम और सुगंधित वादों के बीच चुनावी घंटियां बजते ही नेताजी पुराने समर्थकों की नाव टटोलने लगते हैं। रूठों को मनाया जानें लगा है, आश्वासनों के नए पैकेज फिर खोले जानें लगे हैं। फर्रुखाबाद “वादों और स्वीकृतियों की खुशबू” से महक उठा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि जनपद आज भी अपने आंसू बहा रहा है।

पूरे उत्तर प्रदेश में कहीं भी किसी सड़क पर चलकर देख लीजिए—फर्रुखाबाद लौटते ही बिना आंखें खोले पता चल जाता है कि हम अपने पौराणिक महत्व वाले जनपद में प्रवेश कर चुके हैं। गाड़ी के धक्के और उड़ती धूल स्वागत करती है।
सवाल वही—जवाब कब?

घोषणाओं की लंबी सूची है, मगर धरातल पर परिणाम नगण्य। सवाल यह है कि क्या फर्रुखाबाद सिर्फ घोषणाओं का जनपद बनकर रह जाएगा? क्या यहां का विकास हर बार चुनावी मंच तक सीमित रहेगा? जनता अब तालियों से ज्यादा जवाब चाहती है। क्योंकि सपनों की सड़कों पर चलना आसान है, लेकिन हकीकत की गड्ढों भरी सड़क पर हर रोज़ सफर करना पड़ता है।फर्रुखाबाद पूछ रहा है— घोषणाएं और कितने साल चलेंगी, विकास कब आएगा?

Must read

More articles

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Latest article