स्वास्थ्य मंत्री के कार्यकाल की उपलब्धियां, फर्रुखाबाद से पुराना राजनीतिक रिश्ता और कानपुर मंडल में ब्राह्मण समाज के बीच पकड़—2027 से पहले बढ़ी सियासी चर्चाएं
फर्रुखाबाद/लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती ने 13 अगस्त 2026 को उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद अंटू मिश्रा ने कहा कि वह आगे की राजनीतिक रणनीति कार्यकर्ताओं और समाज के लोगों से राय लेकर तय करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि वह बसपा कार्यकर्ताओं की मदद करते रहे हैं और ब्राह्मण समाज को जोड़ने का काम करते रहे हैं।
निष्कासन के साथ ही सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि अंटू मिश्रा की अगली राजनीतिक पारी कहां से शुरू होगी? राजनीतिक गलियारों में समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों को लेकर चर्चाएं हैं, हालांकि अभी किसी भी दल ने उन्हें लेकर टिकट या औपचारिक शामिल होने की घोषणा नहीं की है।
फर्रुखाबाद से रहा है मजबूत राजनीतिक रिश्ता
अंटू मिश्रा का फर्रुखाबाद से रिश्ता नया नहीं है। 2007 के विधानसभा चुनाव में वह बसपा के टिकट पर फर्रुखाबाद सदर सीट से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। इसके बाद मायावती सरकार में उन्हें स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी मिली। 2011 में 2012 विधानसभा चुनाव के लिए बसपा ने उन्हें फर्रुखाबाद के बजाय लखनऊ उत्तर सीट से मैदान में उतारने का फैसला किया था।
यानी फर्रुखाबाद में उनका राजनीतिक पदार्पण और विधानसभा की पहली बड़ी सफलता दर्ज है। यही वजह है कि 2027 के चुनावी समीकरणों में उनका नाम सामने आते ही फर्रुखाबाद की राजनीति में भी चर्चाओं का दौर शुरू होना स्वाभाविक माना जा रहा है।
स्वास्थ्य मंत्री रहते कई महत्वपूर्ण पहल
अंटू मिश्रा के राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अध्याय उनका स्वास्थ्य मंत्री के रूप में कार्यकाल रहा। उपलब्ध समकालीन रिपोर्टों के अनुसार उनके कार्यकाल में सरकारी अस्पतालों के बुनियादी ढांचे और चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की कई योजनाएं सामने आईं।
कानपुर के उर्सला हॉर्समैन मेमोरियल अस्पताल में 3.37 करोड़ की लागत से पांच मंजिला भवन तैयार कराया गया। इसमें 16 एसी वार्ड, 8 डीलक्स वार्ड, 16 बेड का बाल चिकित्सा वार्ड, 4 बेड की एनआईसीयू , 12 बेड का पेइंग वार्ड और 6 सेमी-प्राइवेट वार्ड शामिल थे। बाल चिकित्सा और एनआईसीयू सेवाओं को मुफ्त रखने की घोषणा भी की गई थी।
इसी दौरान अस्पताल को एडवांस्ड लाइफ सपोर्ट एम्बुलेंस भी उपलब्ध कराई गई, जिसमें वेंटिलेटर और जीवनरक्षक उपकरण थे। स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार के लिहाज से इसे उस समय महत्वपूर्ण सुविधा माना गया था।
पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों पर कार्रवाई
स्वास्थ्य विभाग में अनियमितताओं के खिलाफ अभियान चलाने के निर्देश भी उनके कार्यकाल में दिए गए। पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों की जांच, अवैध गतिविधियों पर कार्रवाई तथा दवाओं और खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए अधिकारियों को अभियान चलाने के निर्देश दिए गए थे।
कानपुर मंडल की राजनीति में ब्राह्मण चेहरा
अंटू मिश्रा की राजनीतिक उपयोगिता का एक पहलू उनका कानपुर और आसपास के क्षेत्र में ब्राह्मण समाज के बीच संपर्क माना जाता है। हालिया घटनाक्रम में उन्होंने स्वयं कहा है कि वह ब्राह्मण समाज को जोड़ने का काम कर रहे थे।
इसी सामाजिक समीकरण को देखते हुए राजनीतिक दलों की निगाहें उन पर होने की चर्चाएं हैं। हालांकि यह दावा कि किसी विशेष दल के बड़े नेता उन्हें पसंद करते हैं, अभी सार्वजनिक रूप से पुष्ट नहीं है; इसलिए इसे राजनीतिक चर्चा और संभावित समीकरण के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
मार्च 2024 में अंटू मिश्रा के लखनऊ स्थित भाजपा कार्यालय पहुंचने की खबर ने भी राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा की थी। रिपोर्ट के मुताबिक वह पार्टी कार्यालय पहुंचे थे, लेकिन उनकी भाजपा में औपचारिक ज्वाइनिंग नहीं हुई। अंटू मिश्रा ने उस समय कहा था कि सभी राजनीतिक दलों में उनके मित्र हैं और केवल मुलाकात के आधार पर अटकल लगाना उचित नहीं है।
इस घटनाक्रम के बाद अब बसपा से निष्कासन ने उनकी अगली राजनीतिक दिशा को लेकर चर्चाओं को फिर तेज कर दिया है।
समाजवादी पार्टी यदि 2027 में ब्राह्मण समाज के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर काम करती है, तो अंटू मिश्रा जैसे अनुभवी और पूर्व मंत्री चेहरे पर विचार की संभावना को राजनीतिक विश्लेषक नकार नहीं रहे हैं। खासकर फर्रुखाबाद से उनका पुराना चुनावी संबंध और कानपुर मंडल में उनका सामाजिक-राजनीतिक संपर्क उनके पक्ष में जाने वाला पहलू हो सकता है।
लेकिन फिलहाल सपा की ओर से अंटू मिश्रा को फर्रुखाबाद से प्रत्याशी बनाने का कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। इसलिए इसे अभी संभावित सियासी दांव के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
2007 में अंटू मिश्रा ने फर्रुखाबाद सदर से जीत दर्ज कर अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दिया था। अब करीब दो दशक बाद यदि कोई दल उन्हें फिर फर्रुखाबाद से मैदान में उतारता है तो मुकाबला दिलचस्प होगा ।
वर्ष 2022 में फर्रुखाबाद सदर सीट भाजपा के मेजर सुनील दत्त द्विवेदी ने 1,12,314 वोट और 53.8 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीती थी। हाल किताब और अब में जमीन आसमान का फर्क हो गया है उत्तर प्रदेश में मोदी लहर थी बीते 10 वर्षों में मेजर सुनील दत्त द्विवेदी अपने जिले के लिए अपनी सरकार में कुछ नहीं ला पाए जिससे उनके प्रति असंतुष्टता की हवा ज्यादा है और ब्राह्मण वर्ग पहले से ही उनसे खासा नाराज है।


