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Thursday, July 23, 2026

अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम अश्लीलता,डिजिटल दौर में मर्यादा तय करना भी जरूरी

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शरद कटियार

इंटरनेट और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ने मनोरंजन की दुनिया को नई दिशा दी है। आज दर्शक अपनी पसंद का कंटेंट अपनी सुविधा के अनुसार देख सकते हैं। यही कारण है कि ओटीटी ने फिल्मों, वेब सीरीज और स्वतंत्र रचनाकारों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। लेकिन इस आज़ादी के साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। यदि मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता, अभद्रता और सामाजिक मर्यादाओं की अनदेखी होने लगे तो सरकार का हस्तक्षेप स्वाभाविक हो जाता है।

केंद्र सरकार द्वारा पिछले दो वर्षों में 50 ओटीटी प्लेटफॉर्म्स की सार्वजनिक पहुंच बंद किए जाने का फैसला इसी बहस को फिर से केंद्र में ले आया है। सरकार का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म्स पर ऐसा कंटेंट प्रसारित किया जा रहा था जो आईटी नियमों और देश के अन्य कानूनों का उल्लंघन करता था। यदि वास्तव में किसी मंच ने कानून की सीमाएं लांघी हैं तो उसके खिलाफ कार्रवाई होना कानून के शासन का हिस्सा है। लेकिन इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि हर कार्रवाई पूरी पारदर्शिता, निष्पक्षता और स्पष्ट कानूनी प्रक्रिया के तहत हो।

डिजिटल युग में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह अधिकार पूर्णतः निरंकुश नहीं है। भारतीय कानून सार्वजनिक शालीनता, नैतिकता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए कुछ सीमाएं भी निर्धारित करते हैं। ऐसे में ओटीटी प्लेटफॉर्म्स को भी यह समझना होगा कि लोकप्रियता हासिल करने के लिए सनसनी, नग्नता या अश्लीलता का सहारा लेना दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।

बीते कुछ वर्षों में यह भी देखने को मिला कि कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने बोल्ड कंटेंट को व्यवसाय का प्रमुख माध्यम बना लिया। दर्शकों की जिज्ञासा को व्यावसायिक लाभ में बदलने की इस होड़ में कई बार सामाजिक संवेदनशीलता और सांस्कृतिक मूल्यों की अनदेखी हुई। दूसरी ओर, अनेक ओटीटी प्लेटफॉर्म्स ऐसे भी हैं जिन्होंने उत्कृष्ट कहानियां, सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषय और उच्च गुणवत्ता वाला मनोरंजन प्रस्तुत किया। इसलिए पूरे ओटीटी उद्योग को एक ही नजर से देखना भी उचित नहीं होगा।

सरकार की कार्रवाई केवल दंड तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। डिजिटल मीडिया के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान रूप से लागू होने वाले मानक विकसित करना समय की आवश्यकता है। यदि नियम स्पष्ट होंगे तो कंटेंट निर्माता भी अपनी सीमाएं समझेंगे और अनावश्यक विवादों से बच सकेंगे। इसके साथ-साथ दर्शकों, विशेषकर अभिभावकों की भी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों और किशोरों की डिजिटल पहुंच पर ध्यान दें तथा उपलब्ध पैरेंटल कंट्रोल जैसे विकल्पों का उपयोग करें।
यह भी सच है कि केवल प्रतिबंध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होता। समाज में डिजिटल साक्षरता, जिम्मेदार कंटेंट निर्माण और दर्शकों की जागरूकता को बढ़ावा देना भी उतना ही आवश्यक है। स्वस्थ मनोरंजन और रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करते हुए कानून का सम्मान सुनिश्चित करना ही लोकतांत्रिक समाज की पहचान है।

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स भारत के मनोरंजन उद्योग का भविष्य हैं। इसलिए उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वे रचनात्मक स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखें। सरकार की जिम्मेदारी कानून लागू करना है, जबकि कंटेंट निर्माताओं की जिम्मेदारी समाज के प्रति अपनी नैतिक जवाबदेही निभाना है। यदि दोनों पक्ष इस संतुलन को समझें, तभी डिजिटल भारत का भविष्य सुरक्षित, सशक्त और संस्कारित बन सकेगा।

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