36 दोषियों को फांसी की सजा सुना चुके हैं जज दिवाकर
मुजफ्फरनगर। हत्या के एक मामले में दोषी को फांसी की सजा सुनाते हुए अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश/फास्ट ट्रैक कोर्ट-3 रवि कुमार दिवाकर ने न्यायिक स्वतंत्रता और अपनी सुरक्षा को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया। 77 पन्नों के फैसले में उन्होंने साफ लिखा कि यदि माफिया, बाहुबली और अपराधियों के दबाव में काम करना पड़े तो वह न्यायिक संस्था से इस्तीफा देना पसंद करेंगे।
जज दिवाकर ने अपने आदेश में कहा कि उनके न्यायालय से लूट और हत्या से जुड़े करीब 100 विचाराधीन मुकदमों की पत्रावलियां वापस लिए जाने से वह आहत हैं। उन्होंने दावा किया कि पत्रावलियां हटाए जाने के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश के माफिया की ओर से उन्हें संदेश भेजा गया कि यदि उन्होंने उनके खिलाफ कोई टिप्पणी की या पीछे पड़े तो उनकी अदालत बदलवा दी जाएगी अथवा जिले से बाहर तबादला करा दिया जाएगा।
फैसले में न्यायाधीश ने लिखा कि “मैं मरना पसंद करूंगा, डरपोक जज कहलवाना नहीं।” उन्होंने कहा कि जब तक वह अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, तब तक सेवा करेंगे, अन्यथा इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायाधीश की कुर्सी पर रहते हुए निर्णय लेने का अधिकार उनका है।
जज दिवाकर ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को फैसले की प्रति भेजने का निर्देश देते हुए गंभीर मामलों की पत्रावलियां बिना उचित कारण एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित न किए जाने की बात कही। उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे अपराधी या बाहुबली अपनी पसंद की अदालत चुनने की स्थिति में न आ सकें।
दिवाकर नवंबर 2025 में बरेली से स्थानांतरित होकर मुजफ्फरनगर आए थे। करीब नौ माह में हत्या के 10 मामलों में एक महिला समेत 23 दोषियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के कारण भी वह चर्चा में रहे हैं। 18 अगस्त को तत्कालीन जिला जज ने उनके न्यायालय से लूट और हत्या के 100 मुकदमे वापस लेकर सत्र न्यायालय में सुनवाई के आदेश दिए थे।


