“जिस राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसके युवा हों, उस राष्ट्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी उन्हीं युवाओं का सम्मान करना है।”
शरद कटियार
भारत केवल एक भौगोलिक सीमा का नाम नहीं है। यह हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति, संघर्ष, बलिदान और लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत स्वरूप है। यह वह भूमि है जिसने दुनिया को बुद्ध का करुणा संदेश दिया, महावीर का अहिंसा का मार्ग दिया, स्वामी विवेकानंद का आत्मविश्वास दिया, महात्मा गांधी का सत्याग्रह दिया और संविधान के रूप में पूरी दुनिया के सामने लोकतंत्र का एक विराट आदर्श प्रस्तुत किया।
आज यही भारत विश्व की सबसे युवा आबादी वाले देशों में अग्रणी है। देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। करोड़ों युवा भारत की अर्थव्यवस्था, विज्ञान, तकनीक, कृषि, सेना, खेल, उद्योग और लोकतंत्र की सबसे बड़ी पूंजी हैं। वर्ष 2047 तक विकसित भारत का जो स्वप्न देश देख रहा है, उसकी सबसे मजबूत नींव भी यही युवा शक्ति है।
लेकिन जब किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात कहने वाले युवाओं की आवाज़ संवाद के बजाय टकराव के वातावरण में खोने लगे, तब चिंता केवल किसी एक घटना की नहीं रहती,चिंता उस लोकतांत्रिक संस्कृति की होती है, जिसे बनाने में करोड़ों भारतीयों ने बलिदान दिया है।
भारत का इतिहास गवाह है कि परिवर्तन की हर महान कहानी युवा कंधों पर लिखी गई।
23 वर्ष के भगत सिंह ने फांसी के तख्ते पर मुस्कुराते हुए भारत को साहस का अर्थ समझाया।
27 वर्ष के चंद्रशेखर आज़ाद ने स्वयं को कभी अंग्रेजों के सामने झुकने नहीं दिया।
18 वर्ष के खुदीराम बोस ने मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं से कहा था,”उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।”
इन महापुरुषों ने कभी यह नहीं कहा कि युवा केवल आदेश मानें। उन्होंने कहा कि युवा सोचें, प्रश्न पूछें, जागें, संघर्ष करें और राष्ट्र निर्माण में भागीदार बनें।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यही है कि यहां सत्ता स्थायी नहीं होती, लेकिन संविधान स्थायी होता है। सरकारें बदलती हैं, विचार बदलते हैं, परिस्थितियां बदलती हैं, लेकिन संविधान नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों की रक्षा करता रहता है।
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार देता है। इसी संविधान ने हमें यह भी सिखाया कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसलिए लोकतंत्र की मजबूती टकराव में नहीं, संवाद में है; भय में नहीं, विश्वास में है।
युवा जब सड़क पर उतरता है तो उसके हाथ में केवल एक तख्ती नहीं होती,उसके साथ उसका भविष्य चलता है, उसके परिवार की उम्मीदें चलती हैं, उसके सपने चलते हैं और एक विकसित भारत का सपना चलता है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में सबसे पहले संवाद, संवेदनशीलता और संयम का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक संस्थाओं की शक्ति इसी में है कि वे मतभेदों को बातचीत से सुलझाने का प्रयास करें।
आज भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, अंतरिक्ष विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा उत्पादन और वैश्विक कूटनीति,हर क्षेत्र में भारत का भविष्य युवा हाथों में है। यदि यही हाथ निराश होंगे, तो राष्ट्र की गति भी प्रभावित होगी,यदि यही हाथ सशक्त होंगे, तो भारत विश्वगुरु बनने की दिशा में और तेज़ी से आगे बढ़ेगा।
यह समय युवाओं को बांटने का नहीं, जोड़ने का है। उन्हें विरोधी मानने का नहीं, सहभागी मानने का है। लोकतंत्र में असहमति देशद्रोह नहीं होती, बल्कि सुधार की संभावना होती है। राष्ट्रवाद का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा नहीं है; राष्ट्रवाद का अर्थ अपने नागरिकों के सम्मान, उनके अधिकारों और उनके भविष्य की रक्षा भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा भी संविधान पर विश्वास रखें, कानून का सम्मान करें, शांतिपूर्ण और जिम्मेदार नागरिक बनें। साथ ही शासन और प्रशासन भी यह सुनिश्चित करें कि लोकतंत्र की आत्मा,संवाद, संवेदना और न्याय,हमेशा सर्वोपरि रहे।
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना है, उसका संविधान है और उसकी युवा शक्ति है। इन तीनों का सम्मान ही राष्ट्र को महान बनाता है। याद रखिए,जब युवा मुस्कुराता है तो राष्ट्र आगे बढ़ता है। जब युवा निराश होता है तो विकास की गति धीमी पड़ जाती है। और जब युवा सम्मान के साथ खड़ा होता है, तब तिरंगा और ऊंचा लहराता है।
यूथ इंडिया का स्पष्ट मत है,युवा किसी दल की संपत्ति नहीं, राष्ट्र की धरोहर हैं। उनकी ऊर्जा को दिशा दीजिए, अवसर दीजिए, विश्वास दीजिए। क्योंकि युवा ही भारत की धड़कन हैं, और भारत उनके सपनों का विशाल शरीर। धड़कन सुरक्षित रहेगी, तभी भारत सशक्त, समृद्ध और विश्व में अग्रणी बनेगा।


