लखनऊ। राजधानी लखनऊ में अवैध निर्माण का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। हालिया अग्निकांड के बाद सामने आए आंकड़ों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सरकारी आदेश जमीन पर क्यों नहीं उतर रहे। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लखनऊ में कुल 25,190 अवैध निर्माण चिन्हित किए गए हैं। इनमें से 23,408 भवनों के ध्वस्तीकरण के आदेश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में कार्रवाई अब तक कागजी फाइलों से आगे नहीं बढ़ सकी है।
यह मुद्दा उस समय और गंभीर हो गया, जब अलीगंज स्थित एक व्यावसायिक भवन में भीषण आग लगने से 15 लोगों की मौत हो गई। जांच में सामने आया कि इसी भवन के खिलाफ 2016 में अवैध निर्माण के कारण ध्वस्तीकरण का आदेश जारी हुआ था, लेकिन दो महीने के भीतर वह आदेश वापस ले लिया गया। इसके बाद वर्षों तक भवन में व्यावसायिक गतिविधियां चलती रहीं, जबकि सुरक्षा मानकों और निर्माण नियमों पर गंभीर सवाल बने रहे।
घटना के बाद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने संबंधित भवन को दोबारा ध्वस्तीकरण नोटिस जारी किया है। साथ ही अवैध निर्माण रोकने में कथित लापरवाही को लेकर 18 अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई है। इनमें पूर्व विहित प्राधिकारी, जोनल अधिकारी और अभियंता शामिल हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब हजारों अवैध निर्माणों की पहचान हो चुकी है और अधिकांश के विरुद्ध ध्वस्तीकरण आदेश भी जारी हैं, तो फिर इन आदेशों का पालन क्यों नहीं हो रहा? यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो क्या कई हादसों को टाला जा सकता था? यही प्रश्न अब शासन और प्रशासन के सामने खड़े हैं।
शहरी नियोजन विशेषज्ञों का कहना है कि अवैध निर्माण केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा विषय है। यदि ध्वस्तीकरण के आदेश वर्षों तक फाइलों में दबे रहें, तो ऐसे निर्माण भविष्य में बड़े हादसों का कारण बन सकते हैं।
अब निगाहें राज्य सरकार और एलडीए की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। लोगों की मांग है कि अवैध निर्माण के खिलाफ बिना भेदभाव और बिना राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के कार्रवाई हो, ताकि शहर में कानून का राज स्थापित हो और भविष्य में किसी निर्दोष को अपनी जान न गंवानी पड़े।


