शरद कटियार
लखनऊ के अलीगंज स्थित पुरनिया क्षेत्र में कोचिंग संस्थान में लगी भीषण आग केवल एक हादसा नहीं है, बल्कि यह हमारी व्यवस्था, निगरानी तंत्र और सुरक्षा मानकों की एक दर्दनाक विफलता का आईना भी है। जिन बच्चों को उनके माता-पिता ने बेहतर भविष्य की उम्मीदों के साथ कोचिंग भेजा था, वे कुछ ही मिनटों में आग और धुएं के बीच जिंदगी की सबसे भयावह लड़ाई लड़ने को मजबूर हो गए। यह त्रासदी केवल 13 परिवारों का निजी दुख नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक पीड़ा है।
हर बड़े हादसे के बाद एक जैसी तस्वीर सामने आती है। दमकल की गाड़ियां दौड़ती हैं, प्रशासन सक्रिय होता है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं और जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया जाता है। लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी नौबत आती ही क्यों है? क्या किसी कोचिंग संस्थान, व्यावसायिक भवन या बहुमंजिला परिसर में सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी नियमित जांच किसकी जिम्मेदारी है?
प्रदेशभर में हजारों कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे भवनों में चल रही है जो मूल रूप से शिक्षा संस्थान के लिए निर्मित ही नहीं थे। संकरी सीढ़ियां, अपर्याप्त निकास मार्ग, अग्निशमन उपकरणों की कमी और सुरक्षा मानकों की अनदेखी आम बात बन चुकी है। जब तक सब कुछ सामान्य रहता है, तब तक इन खामियों पर किसी का ध्यान नहीं जाता। लेकिन जैसे ही कोई दुर्घटना होती है, वही लापरवाही मौत का कारण बन जाती है।
इस घटना ने एक और कड़वी सच्चाई सामने रखी है कि हमारे यहां सुरक्षा अक्सर कागजों तक सीमित रहती है। फायर एनओसी, भवन अनुमति और सुरक्षा प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया कितनी प्रभावी है, यह ऐसे हादसे बार-बार सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं। यदि सभी मानकों का पालन हुआ था तो इतनी बड़ी त्रासदी कैसे हुई? और यदि नहीं हुआ था तो जिम्मेदार अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा हाथरस का कार्यक्रम स्थगित कर तुरंत लखनऊ लौटना और उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक का घटनास्थल पर पहुंचना प्रशासनिक संवेदनशीलता का संकेत है। लेकिन जनता केवल संवेदना नहीं, बल्कि स्थायी समाधान चाहती है। इस हादसे की जांच केवल दोष तय करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे प्रदेश में कोचिंग संस्थानों, स्कूलों, अस्पतालों, मॉल और व्यावसायिक परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था का व्यापक ऑडिट होना चाहिए।
आज जिन घरों में बच्चों की हंसी गूंजनी चाहिए थी, वहां मातम पसरा हुआ है। जिन माता-पिता ने अपने बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष किया, उनके सामने अब यादों के अलावा कुछ नहीं बचा। यह दर्द किसी सरकारी फाइल, जांच रिपोर्ट या मुआवजे की राशि से कम नहीं होगा।
जरूरत इस बात की है कि इस हादसे को एक और खबर बनाकर भुला न दिया जाए। यदि इस त्रासदी से व्यवस्था नहीं बदली, सुरक्षा मानकों को सख्ती से लागू नहीं किया गया और जवाबदेही तय नहीं हुई, तो आने वाले समय में कोई और शहर, कोई और इमारत और कोई और परिवार इसी तरह का दर्द झेलने को मजबूर होगा।
लखनऊ की यह आग केवल एक भवन को नहीं जला गई, उसने हमारी व्यवस्था की कई कमजोरियों को भी उजागर कर दिया है। अब देखना यह है कि राख से सबक निकलता है या फिर अगली त्रासदी का इंतजार किया जाता है।


